Saturday, October 8, 2011

केंद्र सरकार का भ्रामक नजरिया

Dayasagar
दयासागर
ब्रिटिश संसद भारतीय स्वतंत्रता कानून-1947 मुहैया कराती है। इसके अनुसार भारतीय रियासतों के शासक विलय शर्तों को स्वीकार कर भारतीय संघ में शामिल हो सकते हैं। जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित विलय दस्तावेज के मुताबिक- मैं जम्मू-कश्मीर का शासक राज्य की संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए विलय की शर्तों को स्वीकार करता हूं। विलय की ये शर्तें भारतीय स्वतंत्रता कानून-1947 में किसी तरह के संशोधन से नहीं बदलेगा, जब तक कि यह संशोधन मुझे स्वीकार न हो।

तत्कालीन गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया लॉर्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर 1947 को इसे स्वीकार किया था। इसलिए तकनीकी रूप से यह विलय पूर्ण है। लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार ने जिस तरह महाराजा हरि सिंह से व्यवहार किया, उससे भारतीय गणतंत्र में जम्मू-कश्मीर के विलय पर सवाल उठने लगे। 27 अक्टूबर 1947 को गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया ने जिस तरह विलय की शर्तों को स्वीकार किया, उससे पता चलता है कि अभी भी कई महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित हैं।

महाराजा के हस्ताक्षरित विलय दस्तावेज को पत्र के माध्यम से भेजा गया था। इस पत्र में मौजूदा परिस्थितियों को 14 अगस्त 1947 से आगे देरी होने के लिए जिम्मेदार माना गया है। लेकिन हरि सिंह के इस पत्र को देश विरोधी तत्वों ने उद्धृत नहीं किया है। माउंटबेटन द्वारा विलय को स्वीकार करने वाला दस्तावेज भी चिट्ठी में बंद था और इस पर महाराजा का पता लिखा हुआ था। विलय पर सवाल उठाने वाले कुछ लेखकों और समर्थकों ने माउंटबेटन की चिट्ठी का प्रयोग किया है।

भारतीय स्वतंत्रता कानून-1947 और भारत सरकार कानून-1935 के अनुसार, सिर्फ महाराजा ही ब्रिटिश साम्राज्य की रियासतों के बारे में फैसला करने के अधिकारी थे। सिर्फ महाराजा ही अपने इर्द-गिर्द की परिस्थितियों का अवलोकन कर सकते थे। महाराजा ने अपने पत्र में लिखा है कि मैं महामहिम को सूचित करता हूं कि मेरे राज्य में गंभीर स्थिति पैदा हो गई है इसलिए मैं आपकी सरकार से तत्काल मदद का अनुरोध करता हूं। उत्तरी पश्चिमी सीमांत प्रांत के दूरदराज क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर जनजातीय लोगों की घुसपैठ हो रही है। ये लोग मोटर और ट्रकों पर सवार होकर मानेसर व मुजफ्फराबाद मार्ग से हथियारों से लैस होकर आ रहे हैं। यह पाकिस्तान सरकार और उत्तरी पश्चिमी सीमांत प्रांत की सरकार की जानकारी के बिना संभव नहीं है। मेरी सरकार द्वारा बार-बार अपील करने के बावजूद इन हमलावरों को रोकने या राज्य में आने से मना करने का कोई प्रयास नहीं हुआ है।

जम्मू-कश्मीर के लोगों के बारे में महाराजा का कहना था कि मेरे राज्य के मुस्लिमों और गैर मुस्लिमों ने इस हमले में किसी तरह भाग नहीं लिया है। राज्य में आपातकाल की स्थिति के कारण भारतीय संघ से मदद मांगने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इसलिए मैंने ऐसा करने का फैसला किया है और मैं विलय दस्तावेज को आपकी सरकार द्वारा स्वीकार करने के लिए इसे संलग्न करता हूं। महाराजा की यह कार्रवाई उनके तार्किक मूल्यांकन और गहरी सोच का परिणाम था। लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा महाराजा को लिखी चिट्ठी में विलय की शर्तों को स्वीकार करने के बाद भी कुछ अनुत्तरित प्रश्न रह गए हैं।

जवाहर लाल नेहरू की तत्कालीन कैबिनेट से भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं। लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा था कि वीपी मेनन द्वारा दिनांक 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा की लिखी चिट्ठी मुझे मिली है। महाराजा के अनुसार, मेरी सरकार ने भारतीय संघ में कश्मीर के विलय को स्वीकार करने का फैसला किया है। मैं भारतीय नीतियों से सहमत हूं। अगर किसी राज्य में विलय का मुद्दा विवाद का विषय बनता है तो राज्य के लोगों की इच्छा के मुताबिक इस पर फैसला होना चाहिए। मेरी सरकार की इच्छा है कि कश्मीर में कानून व्यवस्था बहाल होने और हमलावरों से यहां की भूमि मुक्त होते ही लोगों की राय से राज्य के विलय का निपटारा होना चाहिए। आपके महाराजा ने अंतरिम सरकार से शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को आपके प्रधानमंत्री के साथ काम करने का न्योता दिया है।

माउंटबेटन की चिट्ठी में वर्णित विलय संबंधी विवाद कहीं भी महाराजा हरि सिंह के रिकार्ड का समर्थन नहीं करती है। केंद्र सरकार और देश के राजनीतिक नेतृत्व ने पत्र से निर्मित जटिलताओं को बुद्धिमानीपूर्वक नहीं निपटाया है। यह पत्र विलय का हिस्सा नहीं है। कुछ लोगों ने इस पत्र को विलय के हिस्से के रूप में प्रोजेक्ट किया है। भारतीय स्वतंत्रता कानून-1947 के अनुसार, रियासत के राजा ही भारतीय संघ में विलय का फैसला लेने के लिए अधिकृत थे।

दिल्ली समझौता-1952 जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच हुआ था, इसमें कहीं भी जम्मू-कश्मीर के महाराजा और युवराज का उल्लेख नहीं है। 8 अगस्त 1953 को शेख अब्दुल्ला के कैबिनेट सहकर्मियों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन-पत्र में उन पर दिल्ली समझौता-1952 को लागू करने में गंभीरता नहीं दिखाने का आरोप लगाया गया है, जिसके शेख खुद शिल्पकार थे। जवाहर लाल नेहरू ने जिस तरह शेख अब्दुल्ला का पक्ष लिया और उन पर निर्भर रहे उससे उनके लिए कठिनाइयां पैदा हो गई।

27 अक्टूबर 1947 को लिखित माउंटबेटन की चिट्ठी से कुछ विवाद का उल्लेख मिलता है। उस समय तक न तो महाराजा और न ही केंद्र सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में गए थे। दिनांक 01 जनवरी 1948 को भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सुरक्षा परिषद में एक शिकायत दर्ज करवाई थी। इसमें विचित्र ढंग से भारत सरकार के समक्ष विलय के अंतिम समाधान के लिए निर्धारित शर्तों का जिक्र किया गया था। साथ ही जम्मू-कश्मीर को राज्य के तौर पर वर्गीकृत कर विलय को विवादास्पद मुद्दा बना दिया गया। जबकि महाराजा द्वारा लिखी गई चिट्ठी में राज्य के लोगों के प्रतिरोध का उल्लेख नहीं मिलता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद छह वर्षों की शिकायत के बाद भी पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों को खाली नहीं करवा सकी है। हालांकि भारतीय स्वतंत्रता कानून-1947 और महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित विलय दस्तावेज के अनुसार, इसकी कोई जरूरत नहीं है।

वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी ने जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के मुखिया शेख अब्दुल्ला को वापस बुला लिया। प्रधानमंत्री के वर्किंग ग्रुप (2006) के अध्यक्ष सगीर अहमद ने भी कोई बढि़या काम नहीं किया है। उन्होंने दिसंबर 2009 में अनुच्छेद 370 से संबंधित, राज्य स्वायत्तता कमेटी और पीडीपी के स्वशासन संबंधी रिपोर्ट सौंपकर भ्रम को बढ़ाने का ही काम किया है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकार पिछले एक साल में यह जान चुके होंगे कि कश्मीर घाटी की राय ही जम्मू-कश्मीर की राय नहीं है। 
(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के जानकार हैं।)

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