Saturday, November 12, 2011

अफस्पा की आवश्यकता

दयासागर
देश में बाह्य प्रायोजित विद्रोह से निपटने के लिए सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) के प्रावधान नितांत आवश्यक हैं। इसके बिना सेना विद्रोह की स्थिति में प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर सकेगी। विशेष परिस्थितियों जैसे कि उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर में इस प्रकार के विशेष कानून की जरूरत है। कश्मीर घाटी से बड़ी संख्या में लोगों की विदाई और जम्मू-कश्मीर की सीमाओं के एक छोर से दूसरी छोर तक आतंकी गतिविधियां बढ़ने के बाद अफस्पा-1990, 1990 का 21 (10 सितंबर 1990) का अस्तित्व सामने आया।

10 सितंबर 2010 को राष्ट्रपति की सहमति के साथ ही 5 जुलाई 2000 का सशस्त्र बल (जम्मू-कश्मीर) विशेषाधिकार अध्यादेश, 1990 रद्द हो गया था। कुछ लोग अफस्पा के प्रावधानों को कठोर मानते हैं। जबकि विपरीत परिस्थितियों में सुरक्षाबलों के परिचालन के लिए प्रतिरक्षा की निश्चित मात्रा आवश्यक है। अफस्पा के निरस्तीकरण पर राजनीतिक वाद-विवाद नया नहीं है। यह मुद्दा वर्ष 2005 में भी गरमाया था। उस समय से अफस्पा को निरस्त करने की मांग उठती रही है।

अगर राज्य सरकार की राय है कि पिछले छह वर्षों में राज्य की स्थिति काफी सुधरी है तो जिन क्षेत्रों में सेना की जरूरत नहीं है, वहां से इस कानून को हटा देना चाहिए। लेकिन यह भी जवाब देना होगा कि 2005 के बाद छह सालों तक कश्मीरी प्रवासी कश्मीर घाटी से बाहर क्यों हैं? उन्हें जो प्रवासी वेतन, प्रवासी राहत और प्रवासी रियायत मिलता है, वह असाधारण परिस्थितियों में दिया जाता है। वैसे राज्य के मुख्यमंत्री ने 21 अक्टूबर को कहा था कि जल्द ही जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों से अफस्पा, डीएए (अशांत क्षेत्र अधिनियम) को हटा लिया जाएगा, पर यह समझ नहीं आया कि उन्होंने साथ-साथ यह क्यों कहा कि वो अभी उन इलाकों के नाम नहीं बता सकते। उन्होंने अशांत क्षेत्रों का उल्लेख क्यों नहीं किया? शांतिपूर्ण क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के लिए अफस्पा के प्रावधानों की जरूरत नहीं होगी।

राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय महत्व के इतने गंभीर मुद्दों पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। कोई भी देश यह सहन नहीं कर सकता। सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों को नागरिक क्षेत्रों में लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए। अफस्पा जैसे कानून सेना को दृढ़ता और तीव्रता से कार्रवाई करने का अधिकार प्रदान करता है, जहां राष्ट्रीय अखंडता और भौगोलिक सीमाओं पर गंभीर खतरा हो। यदि सेना को देश के दुश्मनों की तलाशी के लिए अभियान छेड़ना हो तो उसे बिना समय गंवाए इसे अंजाम देना होता है। लेकिन जिस तरह अफस्पा को प्रोजेक्ट किया जा रहा है उससे लगता है कि अनुचित ढंग से केंद्र सरकार के उद्देश्यों पर आपराधिक आरोप लगाए जा रहे हैं।

वर्ष 1950 में उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिंसा आम बात थी। राज्य प्रशासन और नागरिक पुलिस अंदरूनी गड़बडि़यों पर नियंत्रण स्थापित नहीं कर पा रहे थे और आम नागरिक को सामाजिक और भौतिक सुरक्षा मुहैया कराने में असमर्थ थे। इसलिए राष्ट्रपति ने 22 मई 1958 को सशस्त्र बल (असम और मणिपुर) विशेषाधिकार अध्यादेश की घोषणा कर दी। बाद में (सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून-1958, 1958 का एक्ट नं.-28) यह बिल संसद में पारित हो गया। वर्ष 1947 के बाद स्थानीय कारणों से ये गड़बडि़यां नहीं थी। विदेशी एजेंसियों ने देश विरोधी तत्वों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया था। बाद में ऐसे कानूनों के दुरुपयोग पर रोक होनी चाहिए थी। इसके प्रभाव को बढ़ाते हुए प्रगतिशील तरीके से अरुणाचल प्रदेश कानून-1986 (1986 का 69) और सशस्त्र बल (जम्मू-कश्मीर) विशेषाधिकार कानून-1990 में संशोधन होना चाहिए था-
(1)- सशस्त्र बल (जेएंडके) विशेषाधिकार कानून की धारा 2 के तहत सैन्य बलों और वायु सैनिकों के परिचालन के लिए थल सैनिकों के रूप में इसका उल्लेख करता है और संघ के दूसरे सशस्त्र बलों के परिचालन को इसमें शामिल करता है।

(2)- धारा 3 के तहत अधिसूचना जारी कर अशांत क्षेत्र को घोषित किया गया है। इसलिए अशांत क्षेत्र की घोषणा सेना या सुरक्षाबलों को स्वयं नहीं बल्कि नागरिक अधिकार द्वारा अफस्पा के प्रावधानों का विस्तार होना चाहिए। इसलिए किसी को भी आपात अधिकारों की जिम्मेदारी के लिए मनोदशा को समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। वर्ष 1990 से शर्ते और अवधारणाएं बदल चुकी हैं। शत्रुओं की युद्ध तकनीक भी बदल चुकी है। इसलिए अफस्पा-1990 को लागू करने के लिए कुछ खास बदलाव को समाविष्ट (धारा 3,4,5,6) किया गया है। धारा 3 में, अशांत और खतरनाक शर्तों को अधिक विस्तार मिला है। यह आतंकी गतिविधियों में शामिल स्थापित कानूनों से सरकार को उलटने का निर्देश देता है। या आतंकी हमलों या किसी भी लोगों के बीच विलगाव या उनके बीच सामंजस्य को विपरीत ढंग से प्रभावित करता है।

(3)- यह भारतीय संविधान, राष्ट्रगान, तिरंगे के अपमान का कारण या भारतीय क्षेत्र के एक हिस्से के विखंडन के बारे में या देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को नष्ट करने या इस पर सवाल उठाने या इससे इंकार करने के बारे में निर्देश देता है। इस भाग में आतंकी गतिविधियों का समान अर्थ है जैसा कि भारतीय संविधान की धारा 248 में वर्णित है। इसी प्रकार धारा 4 में सशस्त्र बलों के विशेषाधिकार रद करने का उल्लेख है। इसके तहत किसी भी वाहन में यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति जा रहा हो, जोकि घोषित अपराधी हो या कोई व्यक्ति जो अक्षम्य अपराध किया हो या जिस पर संदेह हो कि वह अक्षम्य अपराध करने वाला है या कोई व्यक्ति हथियार या विस्फोटक ले जा रहा हो, जोकि गैरकानूनी हो, की तलाशी और गिरफ्तारी का जिक्र है।

(4)- इसके तहत सुरक्षा बलों को तलाशी लेने या फिर उसका सामान जब्त करने का अधिकार प्रदान करता है। धारा 5 में तलाशी का अधिकार विशेष रूप से शामिल है। इसके तहत सुरक्षा बलों को ताला तोड़ने का भी अधिकार प्राप्त है। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति की तलाशी ली जा सकती है। सुरक्षा बलों को किसी भी दरवाजे, अलमारी, सुरक्षित बक्से, दराज, पैकेज या अन्य चीजों की तलाशी के लिए ताला तोड़ने का अधिकार प्राप्त है।

इसमें संदेह नहीं कि कुछ लोग विशेषाधिकार का गलत प्रयोग कर रहे हैं। यदा-कदा मानवाधिकार का उल्लंघन भी होता है। कुछ लोग महसूस करते हैं कि वे प्रतिरक्षा की आड़ में कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन यह भी सच है कि किसी भी जगह या किसी भी संगठन में इस प्रकार का एकाध व्यक्ति हो सकता है जो कानून का उल्लंघन या उसका दुरुपयोग कर सकता है। इस तरह के आरोप स्थानीय पुलिस पर भी लगते रहते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि एसएचओ को दिए गए सभी अधिकार उससे छीन लिए जाएं।
(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)


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