Friday, April 13, 2012

“कश्मीर मुद्दे पर वार्ता को इच्छुक है भारत”


वाशिंगटन। विदेश सचिव रंजन मथाई ने विगत दिनों (12 अप्रैल) कहा कि भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता पर आगे बढ़ने एवं कश्मीर मुद्दे पर चर्चा करने का इच्छुक है, लेकिन आतंकवादी संगठनों पर काबू कर पाने में इस्लामाबाद की नाकामी प्रमुख बाधा बनी हुई है। 

मथाई ने एक समाचार-पत्र को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘‘पाकिस्तान की ओर से भारतीय उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने सहित उठाए गए कई हालिया कदम इस बात का संकेत हैं कि वह भारत के साथ रिश्ते सुधारने को लेकर गंभीर है।’’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान को अपनी सरजमीं पर मौजूद आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करनी चाहिए। विदेश सचिव ने कहा कि यह बात भारत को बहुत अखरती है कि मुम्बई हमलों का साजिशकर्ता और लश्कर-ए-तैयबा सरगना हाफिज सईद पाकिस्तान में सरेआम सभाओं को संबोधित करने के साथ टेलीविजन चैनलों पर नजर आ रहा है।

भारतीय अधिकारी मथाई ने कहा कि भारत पर हमला करने वाले आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने में इस्लामाबाद की नाकामी शांति वार्ता की राह में बड़ी बाधक है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की ओर से सईद पर एक करोड़ डॉलर का ईनाम घोषित किया जाना यह सिद्ध करता है कि वाशिंगटन नई दिल्ली के उस विचार से सहमत है कि पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों से बड़ा खतरा है। मथाई ने कहा, ‘‘इससे यह पता चलता है कि हमारी चिंता अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चिंता का विषय बन गया है।’’

उमर अब्दुल्ला को हिन्दुओं की परवाह नहीं


नरेन्द्र सहगल

हाल ही में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का यह कहना कि इस साल के अंत तक सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम को राज्य में समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी, साबित करता है कि वे जिहादी आतंकवादियों व पाकिस्तान-परस्त अलगाववादियों के कितने दबाव में हैं। क्योंकि राज्य में अनुच्छेद 370 के औचित्य पर लगा हुआ सवालिया निशान, देश विभाजन के समय पाकिस्तान से आए लाखों हिन्दुओं की नागरिकता का लटकता मुद्दा, तीन-चार युद्धों में शरणार्थी बने सीमांत क्षेत्रों के बेकसूर नागरिकों का पुनर्वास, जम्मू और लद्दाख के क्षेत्रीय अधिकारों का हनन, अभिशाप बन चुकी लद्दाख की गरीबी, पूरे प्रदेश में व्याप्त आतंकवाद, कश्मीर घाटी से उजाड़ दिए गए चार लाख कश्मीरी हिन्दुओं की घरवापसी तथा पूरे प्रांत के लोगों की अन्य कठिनाइयों के समाधान की कोई ईमानदार कोशिश तो उमर ने अभी तक नहीं की। वास्तविकता तो यह है कि इस प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रताड़ित हो रहे हैं अल्पसंख्यक हिन्दू। यहां तक कि राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक तिरंगे झंडे को जलाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं प्रदेश की राजधानी श्रीनगर के लाल चौक पर पचासों बार हो चुकी हैं।

देशद्रोह में बदला अलगाववाद
दरअसल, स्वतंत्रता के साथ ही जो समस्याएं देश को मिलीं उनका अधिकांश असर जम्मू-कश्मीर पर ही हुआ। देश के शेष प्रांतों की संवैधानिक तथा भौगोलिक समस्याएं धीरे-धीरे निपटा ली गईं। प्रांतीय पुनर्गठन आयोग के माध्यम से प्रांतों का पुनर्गठन, निर्माण तथा जोड़-तोड़ करके एक ही बार में देश का प्रशासनिक ढांचा सुधारने का एक प्रयास हुआ, परंतु जम्मू-कश्मीर देश की इस संवैधानिक परिधि में नहीं आ सका।

परिणामस्वरूप इस प्रदेश की सब समस्याएं जटिल होती चली गईं। अलबत्ता अलगाववाद की भावना खतरनाक मोड़ लेकर देशद्रोह में बदल गई और आतंकवाद के भयंकर अजगर ने सिर उठा लिया, जिसे कुचलने में देश की फौज, सरकार तथा अरबों का धन लग रहा है। लेकिन समस्या बढ़ती ही जा रही है।

6 दशक बीत जाने के बाद भी जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि इस देश के शासकों को बार-बार यह घोषणा करनी पड़ती है कि "जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।" इस घोषणा से संसार भर को यह गलत संदेश मिलता है कि कहीं कोई गड़बड़ है। दिलचस्प और हैरत की बात तो यह है कि भारत में जम्मू-कश्मीर के पूर्ण विलय के बावजूद देश के शासक कहते चले आ रहे हैं कि यह प्रदेश भारत का अभिन्न      हिस्सा है।

कुचले गए संवैधानिक अधिकार
दुर्भाग्य से भारत का संविधान अभी तक पूर्ण रूप से जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं हो सका है। जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक सीमाओं में शेष भारत के नागरिक स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें जम्मू-कश्मीर- का नागरिक बनने का हक नहीं है। वह जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकते, वोट नहीं दे सकते, सरकारी नौकरी नहीं ले सकते और अब तो स्थिति इतनी विस्फोटक हो गई है कि भारत के लोगों के लिए कश्मीर घाटी में स्वतंत्रतापूर्वक घूमना-फिरना भी असंभव है। यह कैसी विडम्बना है कि जम्मू-कश्मीर में भारत का राष्ट्रपति, संसद तथा जनता आज भी विदेशी माने जाते हैं? राष्ट्रपति महोदय वहां आपात स्थिति घोषित नहीं कर सकते। देश की सर्वोच्च संस्था संसद द्वारा बनाए गए कानून वहां लागू नहीं होते। देश के नागरिक वहां के नागरिक नहीं हैं।

यह दयनीय स्थिति यहां तक है कि देश के राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के लिए प्रदेश के हल वाले हरे झंडे का सहारा लेना पड़ता है। अनुच्छेद 370 के अंतर्गत बनी इन देशघातक परिस्थितियों को बदलने के स्थान पर भारत सरकार अलगाववादियों और कट्टरपंथी राजनीतिक दलों के दबाव में आकर जम्मू -कश्मीर को "स्वायत्तता" प्रदान करने की तैयारियां कर रही है।

भेदभाव की पराकाष्ठा

भारत के नागरिकों की बात को छोड़िए, जम्मू- कश्मीर में 1947 में पाकिस्तान से आकर बसे लाखों लोगों को अभी तक नागरिकता नहीं दी गई। ये लोग अपने मूल अधिकारों से भी वंचित किए जा रहे हैं। विभाजन के समय जितने भी हिन्दू पाकिस्तान से आकर भारत के भिन्न-भिन्न हिस्सों में बसे, सबको पाकिस्तान में रह गई उनकी जायदादों के मुआवजे दिए गए, परंतु जम्मू-कश्मीर में आकर बसे लोगों को कुछ नहीं दिया गया। शर्म की बात तो यह है कि जो लोग पाकिस्तान में जाकर बसे हैं वे आज भी वापस आकर अपनी जमीन-मकान वापस लेकर, उसे बेचकर फिर से पाकिस्तान चले जाते हैं, उन्हें कोई रोकता नहीं और कोई पकड़ता नहीं।

जम्मू-कश्मीर में आज तक जम्मू तथा लद्दाख के लोगों को बराबरी के हक नहीं दिए गए। भारत सरकार ने अरबों का धन जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए दिया है। परंतु इस धन का 90 प्रतिशत हिस्सा केवल कश्मीर घाटी में खर्च हो रहा है परिणाम उलटा निकला। इस धन का दुरुपयोग करके कश्मीरी पृथकतावादियों ने आतंक का रास्ता पकड़ लिया। शायद जम्मू और लद्दाख के देशभक्त लोगों को उनके भारत प्रेम की सजा देने के लिए ही उन्हें पिछड़ा रखा जा रहा है। विधानसभा में प्रतिनिधित्व, शिक्षा एवं रोजगार में पक्षपात, विकास कार्यों में असंतुलन इत्यादि सभी क्षेत्रों में जम्मू और लद्दाख कश्मीर घाटी से बहुत पीछे हैं। आज लद्दाख के लोगों की दयनीय आर्थिक स्थिति अभिशाप बनी बैठी है।

भारत-भक्ति की घिनौनी सजा

पाकिस्तान द्वारा थोपे गए चार युद्धों में जम्मू-कश्मीर के सीमांत क्षेत्रों के लोगों को अपने घर-जमीन छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में अस्थाई रूप से जाने के आदेश दिए गए। परंतु ये लोग आज भी भटक रहे हैं। इनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है। राजौरी तथा पुंछ के सीमांत ग्रामों से विस्थापित लोग तो इतने परेशान हैं कि इनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तक समाप्त हो गई है। 1965 तथा 1971 के युद्धों में विस्थापित हुए लोगों की पूरी एक पीढ़ी तबाह हो गई है।

विदेश प्रेरित आतंकवाद से प्रभावित होकर कश्मीर से उजड़े चार लाख से भी ज्यादा कश्मीरी हिन्दू अपनी मातृभूमि से दूर दर-दर भटक रहे हैं। जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकारें भी इनको अपने घरों में भेजने की व्यवस्था नहीं कर सकीं। 22 वर्ष पूर्व कश्मीर के वास्तविक बाशिंदे चार लाख कश्मीरी हिन्दुओं का जबरदस्ती पलायन करवाकर कश्मीर घाटी को पूर्णतया हिन्दू-विहीन करने के पश्चात् अब वहां रह रहे साठ हजार से भी ज्यादा सिखों को इस्लाम कबूल करने अथवा कश्मीर से निकल जाने के जिहादी फरमान जारी किए जा रहे हैं।

दूसरे पाकिस्तान की तैयारी

कश्मीर में लगी अलगाववादी आग को राजनीतिक पैकेजों द्वारा शांत करने के ख्वाब देख रहे कांग्रेसी एवं साम्यवादी संगठनों और इनके कथित प्रगतिशील नेताओं की मुस्लिम तुष्टीकरण की सनक अगर अब भी समाप्त नहीं हुई तो कश्मीर को दूसरा पाकिस्तान बनने से कोई भी रोक नहीं सकेगा। बहुमत के आधार पर मुस्लिम राष्ट्र के निर्माण का इतिहास फिर दोहराया जाएगा।

सारे संसार में शैवमत, बौद्धमत, वैदिक संस्कृति और भारतीय राष्ट्रवाद का प्रचार करने वाले कश्मीर की धरती पर भारत विद्रोह का झंडा उठाकर निजामे मुस्तफा की हुकूमत अर्थात् आजाद इस्लामी मुल्क के नारे बुलंद किए जा रहे हैं।
अरब हमलावरों का सफल प्रतिकार करने वाले सम्राट चंद्रापीड़, तुर्किस्तान से लेकर मध्य एशिया तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज को फहराने वाले सम्राट ललितादित्य, जनकल्याण की वैश्विक अवधारणा को बल प्रदान करने वाले महाराजा अवंतिवर्मन, काबुल पर आधिपत्य जमाने वाले राजा शंकरवर्मन, महमूद गजनवी को दो बार पराजित करने वाले महाराजा संग्रामराज और राजा त्रिलोचनपाल को कश्मीर के इतिहास के पन्नों से मिटाया जा रहा है।

निरंतर बिगड़ रहीं परिस्थितियां

यह देखकर कितना अजीब लगता है कि जब सारा देश स्वतंत्रता की खुशियां मनाने में व्यस्त होता है, उस समय जम्मू-कश्मीर के अधिकांश नागरिकों के पास मनाने के लिए कुछ भी नहीं होता। इस प्रदेश के कई लोगों को वोट का हक नहीं, कइयों को अपने घर में रहने का हक नहीं, कइयों को अपना स्वतंत्र कारोबार करने का हक नहीं। हिन्दुओं को हिन्दू होने की सजा मिल रही है।

केन्द्र और प्रदेश की सरकारों का राजनीतिक छल, एक विशेष समुदाय के तुष्टीरकण पर आधारित वोट बैंक की लालसा, ठोस नीति और सख्त कार्रवाई के अभाव में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी तत्व निरंतर मजबूत होते जा रहे हैं। हिंसक आतंकवाद थम नहीं रहा। इस विदेश प्रेरित आतंकवाद ने हिन्दू मुसलमानों समेत प्रत्येक वर्ग के लोगों के अमन-चैन को बारूदी पलीता लगा दिया है। लगातार बिगड़ रही परिस्थितियों में जी रहे हैं जम्मू-कश्मीर के लोग, विशेषतया हिन्दू समाज।

देशघातक अलगाववादी अभियान

यह भी कैसी विडम्बना है कि एक ओर सारे देश में अल्पसंख्यकों विशेषतया मुस्लिम समाज को सभी प्रकार की राजनीतिक, सामाजिक, मजहबी और आर्थिक सुविधाएं दी जा रही हैं। बहुसंख्यक हिन्दू समाज की पिछड़ी जातियों के संवैधानिक अधिकारों में कटौती करके अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज को प्रत्येक प्रकार के आरक्षण प्रदान करने की होड़ मच रही है। वहीं दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दुओं को सम्मानपूर्वक जीने के अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है।

वर्तमान में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सबसे ज्यादा असर हिन्दुओं पर हुआ है। विशेषतया कश्मीर घाटी में तो हिन्दुओं को अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं रहने दिया गया। शेष दो संभागों जम्मू एवं लद्दाख में भी इसी प्रकार की परिस्थितियां बनाने के लिए अलगाववादी संगठन जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं। अगर निकट भविष्य में पूरे भारत में इस एकतरफा उत्पीड़न के विरुद्ध कोई संगठित प्रयास न हुआ तो इस सीमावर्ती प्रांत को दूसरे पाकिस्तान में तब्दील करने का देशघातक अभियान जोर पकड़ता जाएगा।

Thursday, April 12, 2012

हिंदू श्राइन बिल को लेकर पंडित हो रहे लामबंद


जम्मू। पांच वर्ष से अधर में लटके कश्मीरी हिंदू श्राइन बिल को लेकर सरकार के रवैये के खिलाफ कश्मीरी पंडित फिर लामबंद हो गए हैं। संपत्ति पर बढ़ते अवैध कब्जों से चिंतित पंडित समुदाय ने सड़क पर उतरने की तैयारी कर ली है। पंडित प्रेमनाथ भट्ट मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर तले शुरू होने वाले संघर्ष के लिए बैठकों का दौर जारी है।
ट्रस्ट के चेयरमैन एएन पंडिता के नेतृत्व में अन्य संगठन फिर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने को तैयार हैं। बुधवार को यहां बैठक के दौरान ट्रस्ट के नेताओं ने बजट सत्र के दौरान बिल को विधानसभा में न लाए जाने पर रोष जताया। ट्रस्ट के राष्ट्रीय प्रवक्ता हीरा लाल भट्ट ने पंडित समुदाय को गुमराह करने के लिए सरकार को आड़े हाथों लिया। साथ ही कहा कि पंडित अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। ट्रस्ट तब तक अपना संघर्ष जारी रखेगा जब तक सरकार वादी में पंडितों की धार्मिक स्थलों व मंदिरों की संपत्ति को संरक्षित नहीं करती। (12/04/2012)

हुर्रियत से मिले कश्मीर हिंदू
जम्मू। कश्मीर मसले को सिविल सोसायटी द्वारा सुलझाने के उद्देश्य से कश्मीरी पंडितों का एक शिष्टमंडल हुर्रियत कांफ्रेंस के दोनों धड़ों से मिला है। कुछ वरिष्ठ नेताओं सहित इस शिष्टमंडल ने लगातार तीन दिन सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक से मुलाकात की। उन्होंने कश्मीर की सिविल सोसायटी के साथ बैठ कर कश्मीर मसले के समाधान की वकालत की। उन्होंने कहा कि कश्मीर मसले के हल को लेकर पंडित समुदाय राज्य व केंद्र सरकार के तरीकों से असंतुष्ट है। हालांकि, कुछ पंडित संगठनों ने इसका जोरदार विरोध किया है। इनका कहना है कि आतंकवादियों को शह देने वाली हुर्रियत कांफ्रेंस के गिलानी जैसे कट्टरपंथी नेता की कश्मीरी पंडितों को वापस वादी आने की अपील और उन्हें सुरक्षा मुहैया करवाने का आश्वासन अपने आप में एक कोरा मजाक है।
पनुन कश्मीर के डॉ. अजय चरंगू ने कहा कि चंद पंडित नेताओं का हुर्रियत कांफ्रेंस के साथ मिलकर कश्मीर मसले का समाधान तलाशना पंडित समुदाय का मजाक उड़ाना है। जो लोग पंडितों को कश्मीर से खदेड़ने के लिए जिम्मेदार हैं, वही अब पंडितों के पैरोकार कैसे हो सकते हैं? पनुन कश्मीर के ही अश्विनी चरंगू का कहना है कि पंडित समुदाय ने किसी को यह हक नहीं दिया कि वह अलगाववादियों के साथ वार्ता करे और अगर कोई करता है तो वह अपने निहित स्वार्थो के लिए कर रहा है। हुर्रियत से मिले शिष्टमंडल में जस्टिस बीएल सर्राफ, प्रेमनाथ भट मेमोरियल ट्रस्ट के ट्रस्टी, कश्मीरी पंडित सभा के प्रेजिडेंट प्रो. ए एन साधू, गांधी कॉलेज कश्मीर के अध्यक्ष एक के दीवानी, यूथ ऑल इंडिया कश्मीरी समाज के प्रेजिडेंट आर के भट आदि शामिल थे। (12/04/2012)

यात्रा बनाम कश्मीर मसला

यात्रा बनाम कश्मीर मसला केवल कृष्ण पनगोत्रा
पाकिस्तानी शासकों की भारत यात्रा की लंबी कड़ी में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का नाम भी जुड़ गया। क्या पाया और क्या खोया? बस दोनों देशों की जनता, नेताओं और विश्लेषकों की ओर से स्वाभाविक और पूर्व परिचित सामान्य प्रतिक्रियाएं और थोड़ी बहुत औपचारिकताएं ताकि दोनों देशों के शासकों के मिलाप को जमीनी हकीकत का रूप मिल सके। मात्र 40 मिनट की बातचीत में आखिर क्या समा सकता था और वह भी एक निजी यात्रा में जब दौरे को लेकर कोई विशेष पूर्वाभास नहीं था।

जनता किसी भी अपेक्षा से पूर्णतया मुक्त ही दिखी। बेशक जिन मुद्दों पर बातचीत हुई उनमें कश्मीर के अलावा अन्य मुद्दे आम आदमी की नजर में इतने महत्वपूर्ण नहीं थे कि उनके दिलो-दिमाग में आशाओं और अपेक्षाओं का ज्वार उठता। कारण, जब तक किसी पाकिस्तानी शासक के भारत दौरे पर कश्मीर का रंग न चढ़े तो ऐसी यात्रा को सामान्य और रुखी समझे जाने में आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कारण यह है कि 1947 से ही जब देश का धर्माधारित द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर विभाजन हुआ दोनों देशों के संबंध प्रगाढ़ नहीं रहे और न ही उनमें अपेक्षानुसार प्रगति हुई। दोनों देशों के संबंधों को लेकर मुख्य मुद्दा कश्मीर ही रहा। द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध, क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग, व्यापार संबंधी मामलों की परस्पर तारीफें, वीजा नियमों में संशोधन आदि बातें सामान्यत: ज्यादा आकर्षित नहीं करती। उद्योगपतियों को मल्टीपल विजिट वीजा बेशक प्रसन्न करने वाला हो लेकिन आतंकवाद से पीडि़त जम्मू-कश्मीर की अवाम को इस दौरे से पूर्ववर्ती दौरों की भांति कुछ खास नजर नहीं आया।

इन बातों के मद्देनजर लोग न निराश थे और न ही आशावान। नेता, राजनेता, सरकार समर्थित विश्लेषक और बुद्धिजीवी जो चाहे कहें, आम जनता और सामाजिक हलकों में जिन बातों को लेकर आशा और अपेक्षा थी वह इस दौरे के दौरान अछूती ही रहीं। कश्मीर, आतंकवाद, सियाचिन, वीजा, व्यापार, क्रिकेट आदि मुद्दों पर बात जरूर किसी नतीजे पर पहुंच सकती है लेकिन मुख्य मुद्दे कश्मीर और आतंकवाद को लेकर ठोस नतीजों की संभावना जरा दूर की बात है। बेशक हम पाकिस्तान से यह उम्मीद करते हैं कि वह कश्मीर मसले के समाधान के लिए भारत से सहयोग करेगा, लेकिन पिछले अनुभवों के दृष्टिगत और उसके चिरपरिचित स्टैंड के चलते यह इतना आसान भी नहीं है। हालांकि इस बातचीत में पाकिस्तान की ओर से कश्मीर मुद्दे के समाधान की मांग की गई है मगर जिस तरह इस दौरे के दौरान हाफिज सईद के मुद्दे को जरदारी टाल गए उसे देखते हुए पाकिस्तान की अंदरूनी मजबूरियों को समझा जा सकता है।

मुम्बई हमले के दोषियों को सजा दिलाने के मुद्दे पर जरदारी अदालती प्रक्रिया की पेचीदगियां ही गिनाते रहे। इसलिए जैसा कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि बैठक में उम्मीद से ज्यादा मुद्दों पर बातचीत हुई, राज्य की जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं लगता। हालांकि मुख्यमंत्री ने सोशल साइट ट्विटर पर यह भी स्वीकार किया कि जरदारी के दौरे के एजेंडे में कश्मीर मसला शामिल नहीं रहा। यह कहकर एक प्रकार से उन्होंने राज्य की जनता के दिल की बात ही कही है। हो सकता है उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर मसले की बात करते हुए ऐसे समाधान की उम्मीद की हो जो अधिकतर कश्मीर केंद्रित सियासत की पसंद हो लेकिन यह अवश्य है कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए राज्य के जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों की जनता भी समान रूप से चिंतित है।

चाहे अलगाववादी हों या मुख्य धारा से जुडे़ लोग दोनों हलकों में कश्मीर मसला चिंता का विषय है। दोनों ही हलके बातचीत जारी रखना चाहते हैं। जरदारी के दौरे पर अलगाववादी मीरवाइज उमर फारूक का कहना है कि जरदारी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। मुलाकातें अच्छी हैं, लेकिन ये आगे नहीं बढ़ती। पाकिस्तान के राष्ट्रपति का दौरा निजी था। मुफ्ती मुहम्मद सईद ने इसे मात्र अच्छी पहल ही कहा है और भाजपा के निर्मल सिंह का मानना है कि यह बातचीत एक दिखावा है। पाकिस्तान आतंकवाद को लगातार शह दे रहा है। इन प्रतिक्रियाओं से जाहिर होता है कि राज्य की जनता के लिए जितना अहम कश्मीर मुद्दा है उतना शायद ही कोई दूसरा मुद्दा हो। अत: जरदारी के दौरे से राज्य की जनता में कोई विशेष उत्साह देखने को नहीं मिला।

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी की मुलाकात से राज्य की जनता को शायद ही कोई सरोकार हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान भारत से अच्छे संबंध चाहता है। शायद यही वजह है कि पाकिस्तान भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने में कुछ रुचि दिखाई देता नजर आ रहा है। समस्या मात्र यही है कि पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम लगाने का इच्छुक नजर नहीं आ रहा। वह एक तरफ तो स्वयं को आतंकवाद का शिकार मान रहा है जबकि दूसरी ओर भारत आतंकवाद और कश्मीर मसले के समाधान में कोई ठोस प्रगति करता नजर नहीं आता। हैरानी तो तब होती है जब पाकिस्तानी शासक ऐसे बयान देते हैं जिनसे कश्मीर मसले के समाधान में प्रगति के बजाए अवनति ही नजर आने लगती है। आखिर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी का कुछ माह पूर्व यह कहना कि अगर पाकिस्तान को एक हजार साल तक भी भारत से लड़ना पड़े तो वह कश्मीर की खातिर लड़ेंगे। 1989 में चर्म पर पहुंचा आतंकवाद पाकिस्तानी शासकों की ऐसी ही फितरत का एक उदाहरण है।

पाकिस्तान अभी भी कश्मीर में जनमत-संग्रह की पैरवी करता नजर आता है। पाक परस्त अलगाववादी अभी भी कश्मीर को द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर पाकिस्तान में शामिल करना चाहते हैं। आजादी और जनमत-संग्रह की दलील तो मात्र एक छलावा है। यकीनन यही कारण है कि 1951 से ही पाकिस्तान और वर्तमान में अलगाववादी भी जनमत-संग्रह की मांग को दोहरा रहे हैं। इस दृष्टि से जरदारी का भारत दौरा उम्मीद के मुताबिक उत्साहजनक नहीं रहा।
(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)