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Thursday, April 12, 2012

यात्रा बनाम कश्मीर मसला

यात्रा बनाम कश्मीर मसला केवल कृष्ण पनगोत्रा
पाकिस्तानी शासकों की भारत यात्रा की लंबी कड़ी में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का नाम भी जुड़ गया। क्या पाया और क्या खोया? बस दोनों देशों की जनता, नेताओं और विश्लेषकों की ओर से स्वाभाविक और पूर्व परिचित सामान्य प्रतिक्रियाएं और थोड़ी बहुत औपचारिकताएं ताकि दोनों देशों के शासकों के मिलाप को जमीनी हकीकत का रूप मिल सके। मात्र 40 मिनट की बातचीत में आखिर क्या समा सकता था और वह भी एक निजी यात्रा में जब दौरे को लेकर कोई विशेष पूर्वाभास नहीं था।

जनता किसी भी अपेक्षा से पूर्णतया मुक्त ही दिखी। बेशक जिन मुद्दों पर बातचीत हुई उनमें कश्मीर के अलावा अन्य मुद्दे आम आदमी की नजर में इतने महत्वपूर्ण नहीं थे कि उनके दिलो-दिमाग में आशाओं और अपेक्षाओं का ज्वार उठता। कारण, जब तक किसी पाकिस्तानी शासक के भारत दौरे पर कश्मीर का रंग न चढ़े तो ऐसी यात्रा को सामान्य और रुखी समझे जाने में आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कारण यह है कि 1947 से ही जब देश का धर्माधारित द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर विभाजन हुआ दोनों देशों के संबंध प्रगाढ़ नहीं रहे और न ही उनमें अपेक्षानुसार प्रगति हुई। दोनों देशों के संबंधों को लेकर मुख्य मुद्दा कश्मीर ही रहा। द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध, क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग, व्यापार संबंधी मामलों की परस्पर तारीफें, वीजा नियमों में संशोधन आदि बातें सामान्यत: ज्यादा आकर्षित नहीं करती। उद्योगपतियों को मल्टीपल विजिट वीजा बेशक प्रसन्न करने वाला हो लेकिन आतंकवाद से पीडि़त जम्मू-कश्मीर की अवाम को इस दौरे से पूर्ववर्ती दौरों की भांति कुछ खास नजर नहीं आया।

इन बातों के मद्देनजर लोग न निराश थे और न ही आशावान। नेता, राजनेता, सरकार समर्थित विश्लेषक और बुद्धिजीवी जो चाहे कहें, आम जनता और सामाजिक हलकों में जिन बातों को लेकर आशा और अपेक्षा थी वह इस दौरे के दौरान अछूती ही रहीं। कश्मीर, आतंकवाद, सियाचिन, वीजा, व्यापार, क्रिकेट आदि मुद्दों पर बात जरूर किसी नतीजे पर पहुंच सकती है लेकिन मुख्य मुद्दे कश्मीर और आतंकवाद को लेकर ठोस नतीजों की संभावना जरा दूर की बात है। बेशक हम पाकिस्तान से यह उम्मीद करते हैं कि वह कश्मीर मसले के समाधान के लिए भारत से सहयोग करेगा, लेकिन पिछले अनुभवों के दृष्टिगत और उसके चिरपरिचित स्टैंड के चलते यह इतना आसान भी नहीं है। हालांकि इस बातचीत में पाकिस्तान की ओर से कश्मीर मुद्दे के समाधान की मांग की गई है मगर जिस तरह इस दौरे के दौरान हाफिज सईद के मुद्दे को जरदारी टाल गए उसे देखते हुए पाकिस्तान की अंदरूनी मजबूरियों को समझा जा सकता है।

मुम्बई हमले के दोषियों को सजा दिलाने के मुद्दे पर जरदारी अदालती प्रक्रिया की पेचीदगियां ही गिनाते रहे। इसलिए जैसा कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि बैठक में उम्मीद से ज्यादा मुद्दों पर बातचीत हुई, राज्य की जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं लगता। हालांकि मुख्यमंत्री ने सोशल साइट ट्विटर पर यह भी स्वीकार किया कि जरदारी के दौरे के एजेंडे में कश्मीर मसला शामिल नहीं रहा। यह कहकर एक प्रकार से उन्होंने राज्य की जनता के दिल की बात ही कही है। हो सकता है उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर मसले की बात करते हुए ऐसे समाधान की उम्मीद की हो जो अधिकतर कश्मीर केंद्रित सियासत की पसंद हो लेकिन यह अवश्य है कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए राज्य के जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों की जनता भी समान रूप से चिंतित है।

चाहे अलगाववादी हों या मुख्य धारा से जुडे़ लोग दोनों हलकों में कश्मीर मसला चिंता का विषय है। दोनों ही हलके बातचीत जारी रखना चाहते हैं। जरदारी के दौरे पर अलगाववादी मीरवाइज उमर फारूक का कहना है कि जरदारी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। मुलाकातें अच्छी हैं, लेकिन ये आगे नहीं बढ़ती। पाकिस्तान के राष्ट्रपति का दौरा निजी था। मुफ्ती मुहम्मद सईद ने इसे मात्र अच्छी पहल ही कहा है और भाजपा के निर्मल सिंह का मानना है कि यह बातचीत एक दिखावा है। पाकिस्तान आतंकवाद को लगातार शह दे रहा है। इन प्रतिक्रियाओं से जाहिर होता है कि राज्य की जनता के लिए जितना अहम कश्मीर मुद्दा है उतना शायद ही कोई दूसरा मुद्दा हो। अत: जरदारी के दौरे से राज्य की जनता में कोई विशेष उत्साह देखने को नहीं मिला।

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी की मुलाकात से राज्य की जनता को शायद ही कोई सरोकार हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान भारत से अच्छे संबंध चाहता है। शायद यही वजह है कि पाकिस्तान भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने में कुछ रुचि दिखाई देता नजर आ रहा है। समस्या मात्र यही है कि पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम लगाने का इच्छुक नजर नहीं आ रहा। वह एक तरफ तो स्वयं को आतंकवाद का शिकार मान रहा है जबकि दूसरी ओर भारत आतंकवाद और कश्मीर मसले के समाधान में कोई ठोस प्रगति करता नजर नहीं आता। हैरानी तो तब होती है जब पाकिस्तानी शासक ऐसे बयान देते हैं जिनसे कश्मीर मसले के समाधान में प्रगति के बजाए अवनति ही नजर आने लगती है। आखिर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी का कुछ माह पूर्व यह कहना कि अगर पाकिस्तान को एक हजार साल तक भी भारत से लड़ना पड़े तो वह कश्मीर की खातिर लड़ेंगे। 1989 में चर्म पर पहुंचा आतंकवाद पाकिस्तानी शासकों की ऐसी ही फितरत का एक उदाहरण है।

पाकिस्तान अभी भी कश्मीर में जनमत-संग्रह की पैरवी करता नजर आता है। पाक परस्त अलगाववादी अभी भी कश्मीर को द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर पाकिस्तान में शामिल करना चाहते हैं। आजादी और जनमत-संग्रह की दलील तो मात्र एक छलावा है। यकीनन यही कारण है कि 1951 से ही पाकिस्तान और वर्तमान में अलगाववादी भी जनमत-संग्रह की मांग को दोहरा रहे हैं। इस दृष्टि से जरदारी का भारत दौरा उम्मीद के मुताबिक उत्साहजनक नहीं रहा।
(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)

Thursday, April 5, 2012

अनुचित है जम्मू की उपेक्षा


केवल कृष्ण पनगोत्रा
देश के किसी भी राज्य की विधानसभा या फिर लोकसभा के सत्र में कुछ सुखाभासों में कुछ तल्खियां और गलतियां भी रहीं। ऐसे अनुभव होते आए हैं मगर ऐसी गलतियों में शायद ही कहीं इतिहास को जानबूझ कर अनदेखा किया गया हो। इतिहास को नकारने और किसी विशेष घटना को कमतर करके देखने के पीछे कारण, नीति और नीयत कभी भी नेक नहीं हो सकती। हां, अगर कहीं किसी ऐतिहासिक संदर्भ को दबाया या छिपाया जाता है या किसी दृष्टि विशेष से प्रस्तुत किया जाता है तो ऐसी सोच के पीछे बृहतर सामाजिक हितों को ध्यान में रखा जाता है मगर यह समझ से परे है कि जम्मू-कश्मीर सरकार के बजाय राज्य को कश्मीर कहने के पीछे क्या हितार्थ हैं? सत्ता और शासक चाहे जो करें लेकिन मौलिक इतिहास पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों वर्षो तक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। प्रत्येक मनुष्य, परिवार, गांव-शहर, क्षेत्र, राज्य और देश का एक मौलिक इतिहास होता है और दृष्टि या सुविधा अनुसार उसे लिखा, पढ़ा और पढ़ाया जाता है मगर मौलिकता कहीं न कहीं जिंदा रहती है। 1846 की अमृतसर संधि के बाद से जम्मू-कश्मीर एक ही राजनैतिक इकाई है। यही मौलिक ऐतिहासिक सच्चाई है। कैसे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्रों को जोड़कर एक राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ? जम्मू के साथ कश्मीर और लद्दाख कैसे जुड़े? जम्मू व कश्मीर राज्य के वजूद के पीछे एक लंबी राजनैतिक, सामाजिक और सामरिक कवायद जुड़ी है। इतिहास की जानकारी रखने वाला एक बड़ा तबका इस कवायद से वाकिफ है मगर हैरानी की बात है कि धार्मिक द्विराष्ट्रवाद के आधार पर भारत विभाजन और जम्मू-कश्मीर के भारत में संपूर्ण विलय के बाद व कुछ वर्ष पहले से ही डोगरा राज और डुग्गर प्रदेश की पहचान को समाप्त करने की कश्मीर केंद्रित मानसिकता राज्य के मौलिक इतिहास को क्षेत्रीय रंग देने की चतुर-चालाक कवायद में संलिप्त है। राज्य विधानसभा के अभी संपन्न हुए बजट सत्र में भी ऐसी मानसिकता पर विधायक हर्षदेव सिंह और कई दूसरे विधायक काफी नाराज दिखाई दिए। मुद्दा यह था कि राज्य की प्रशासनिक सेवाओं के बाद सरकार से भी जम्मू का नाम काट दिया गया है। उद्योग विभाग के एक लिखित जवाब में बार-बार जम्मू-कश्मीर सरकार या मात्र सरकार शब्दों की जगह कश्मीर सरकार का जिक्र होने पर विधायकों ने कहा कि कश्मीर प्रशासनिक सेवा, कश्मीर पुलिस सेवा, कश्मीर न्यायिक सेवा की जगह अब कश्मीर सरकार कहना सीधे तौर पर जम्मू की ऐतिहासिक पहचान को नजरअंदाज करना है। विदित रहे कि यह कोई नई बात नहीं है जब राज्य से जम्मू और लद्दाख की पहचान को समाप्त करने की हरकतें सामने आई हैं। यहां तक कि कश्मीर घाटी के कस्बों-शहरों और पर्वतों को आपत्तिजनक नाम दिए जा रहे हैं। इस संदर्भ में राज्य विधानसभा की कार्यवाही के दौरान वर्ष 2001 में जब कश्मीर के अनंतनाग शहर को इस्लामाबाद कहा गया तो राज्य के एक विधायक अब्दुल मजीद मीर ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सभा में सवाल उठाया था कि क्या सरकार ने दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले को आधिकारिक रूप से इस्लामाबाद (पाकिस्तान) मान लिया है? यह गलती है या साजिश? राज्य में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो जम्मू और लद्दाख की पहचान और वजूद को समाप्त करने करने के बाद कश्मीर (यानी जम्मू-कश्मीर) को पाकिस्तान साबित करना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश भारत का एक मुस्लिम बहुल प्रदेश है मगर ऐसा लग रहा है कि कश्मीर में घर के भेदियों द्वारा ही सांप्रदायिक सद्भाव को चोट पहुंचाने के नापाक इरादों पर एक साजिश के तहत कार्य हो रहा है। समझने लायक है कि सरकार अनंतनाग को इस्लामाबाद और राज्य के मौलिक वजूद और इतिहास में से जम्मू को नकारने की इजाजत कैसे दे रही है? इन्हीं सवालों और चिंताओं के दृष्टिगत जम्मू और लद्दाख का बौद्धिक वर्ग चिंतित है। 25 मार्च को पब्लिक ओपिनियन फोर्म में चैलेंजर्स विफोर जम्मू रीजन-डे आउट इन द प्रेजैंट पॉलिटिकल सनेरियो विषय को लेकर चिंताएं जताते हुए जम्मू को अलग राज्य का दर्जा देने की पैरवी करते हुए जम्मू और लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करने का आक्षेप लगाते हुए राज्य के कुल क्षेत्रफल में से मात्र 16 प्रतिशत क्षेत्र वाली कश्मीर घाटी के जम्मू और लद्दाख पर दबदबे पर बहस में भेदभाव के अनेक उदाहरण गिनाए हैं। बेशक जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अलग क्षेत्र थे लेकिन अब पूरा विश्व जानता है कि 16 मार्च 1846 की अमृतसर संधि के बाद आधुनिक जम्मू-कश्मीर वजूद में आया और महाराजा गुलाब सिंह इस समूचे राज्य का संस्थापक शासक था। 26 अक्टूबर 1947 का विलय दस्तावेज जम्मू-कश्मीर (जिसमें जम्मू-कश्मीर, उत्तरी क्षेत्र, लद्दाख और अक्साई चिन शामिल हैं) को भारत का अटूट अंग दर्शाता है। जम्मू-कश्मीर के शासक भी इस बात को स्वीकार करते हैं मगर केंद्र सरकार के दब्बूपन के कारण राज्य में कश्मीर केंद्रित मानसिकता से ग्रस्त कुछ लोग और जम्मू सूबा का स्वार्थपरक नेतृत्व ऐसे लोगों के दुस्साहस की ही पुष्टि कर रहे हैं जो स्थापित और मौलिक इतिहास को नजरअंदाज करते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सांप्रदायिक लकीरें खींचने के प्रयास कर रहे हैं। हर स्तर पर जम्मू और लद्दाख को कमतर करके आंका जा रहा है। आंकड़े, घटनाक्रम और कश्मीर केंद्रित मानसिकता से परिपूर्ण होने वाली खुराफातें इस तल्ख सच्चाई की गवाही देती हैं। राज्य की सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान और अस्तित्व से जम्मू को कमतर करके आंकना और मौलिक इतिहास को नकारना साधारण गलती या सामान्य बात नहीं लगती। राज्य के अस्तित्व में तीनों हिस्सों की अपनी अलग-अलग भौगोलिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता है जिसे नकारने की गलती भारत जैसे सेक्यूलर देश में बड़ी गलती के सिवाए और कुछ नहीं होगा।
(लेखक जेएंडके के सामाजिक विषयों के अध्येता हैं)  

Tuesday, March 27, 2012

तार्किक नहीं मीडिया का मखौल


केके पनगोत्रा
विश्व के कुछ देश जिनमें भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और इंग्लैंड का नाम मुख्य रूप से लिया जा सकता है, अपने देशों को विश्वभर में सर्वोत्तम प्रजातांत्रिक प्रणाली के हामी कहते हैं। यह बात सही भी है। विश्व के इन दोनों उत्कृष्ट संविधानों की भावनाओं के समावेश भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक प्रणाली में भी दृष्टिगोचर होते हैं। चूंकि भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था का निर्माण इन दोनों देशों में लोकतांत्रिक निर्माण के बाद की घटना है इसलिए संविधान निर्माताओं ने विश्व की श्रेष्ठ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के गहन अध्ययन के बाद उनका अनुसरण करते हुए कुछ महत्वपूर्ण तत्वों का समावेश भारतीय संविधान में कर डाला ताकि भारत विश्व के श्रेष्ठत्तम लोकतंत्र में गिना जाए। इस तरह से जो लोकतांत्रिक व्यवस्था सामने आई उसके चार मुख्य स्तंभ उभर के सामने आए। यह स्तंभ हैं-विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस। (अब प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया इस चौथे स्तंभ का संयुक्त रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं।) अनैतिकता, भ्रष्टाचार, स्वार्थ और सत्तालोलुप्ता के दीमक समान रूप से भारतीय लोकतंत्र के चारों पायों को चाट रहे हैं, मगर मीडिया का विस्तृत और बढ़ता स्वरूप इस दीमक के प्रभाव में नहीं आ रहा। वर्तमान में भारतीय लोकतंत्र में अगर कहीं कुछ शुभ और संतोषजनक है तो वह है मीडिया की स्वतंत्रता। राज्य की शीतकालीन राजधानी जम्मू में विधानसभा के जारी सत्र के दौरान भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने सियासतबाजी का एक नया दंभपूर्ण रूप देखा। जम्मू-कश्मीर से इतर भारत में भी मीडिया पर पहरे बिठाने और दबाने के प्रयास हुए हैं। तहलका डॉट काम के तहलके के बाद जिस प्रकार का घटनाक्रम और प्रतिक्रियाएं तत्कालीन सत्ता के गलियारों की ओर से व्यक्त की गई उनसे तो यही लगने लगा था कि लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ मीडिया पर पहरा बैठ जाएगा। सरकार पत्रकारिता की आचार संहिता तैयार करने में जुट गई। मगर जनता और न्यायपालिका की सहानुभूति और मीडिया जगत की प्रतिक्रिया से सरकार में बैठे लोकतंत्र विरोधी तत्वों को पीछे हटना पड़ा। लोकतंत्र के कथित पैरोकार यह भी भूल जाते हैं कि लोकतंत्र की परिभाषा मात्र प्रौढ़ मताधिकार तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे आगे निकलकर सूचना यानी जानने और अभिव्यक्ति का अधिकार भी स्वस्थ लोकतंत्र का ही हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा की ताजा घटना के संदर्भ में, जहां स्पीकर ने मीडिया को लेकर टिप्पणी की थी कि मीडिया उनके नियंत्रण में है और मीडिया को समाचार के स्रोत बताने चाहिए लोकतंत्र के संरक्षण के लिए पत्रकारों को दो दिन तक विधानसभा की कार्यवाही को मीडिया कवरेज से वंचित रखना पड़ा। प्रतिपक्ष विशेषत: पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने पत्रकारों का साथ दिया। कारण चाहे राजनीतिक ही रहे हों लेकिन प्रतिपक्ष ने मीडिया की स्वतंत्रता को लोकतंत्र के लिए सर्वोपरि माना। मगर सत्ता और मीडिया के टकराव की जो नई इबारत जम्मू-कश्मीर में लिखी गई उसने सत्ता के दंभ की बानगी समूचे भारत में प्रस्तुत की है। सत्ता और मीडिया का टकराव भारत में नया नहीं है। मीडिया पर लगाम लगाने की कई कोशिशें की गई हैं। फिर भी सभ्य नागरिक हलकों और आम जनता ने मीडिया से सहानुभूति की मिसाल कायम करते हुए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को धराशायी नहीं होने दिया। सियासतबाजों की चले तो लोकतंत्र का जनाजा ही निकाल दें मगर स्वतंत्र मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का चौथा पाया अभी जनता की सहानुभूति और विश्वास पर अटल खड़ा है। इन परिस्थितियों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जनता को भ्रष्टाचारियों और उनके कुकृत्यों की जानकारी नहीं होनी चाहिए? क्या किसी भ्रष्टाचारी के कुकृत्यों की ताक-झांक नहीं होनी चाहिए? भारत विश्व का सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र माना जाता है। अत: इन प्रश्नों को दूसरे लोकतांत्रिक देशों के संदर्भ में भी जांचा-परखा जाना चाहिए। एक बार अमेरिका के द वाशिंगटन पोस्ट समाचार पत्र ने संयुक्त राज्य अमेरिका के सुरक्षा विभाग के गुप्त कारनामों को लेकर एक लेख प्रकाशित किया था। संबंधित दस्तावेज एक पूर्व विभागीय अधिकारी डेनियल ऐल्सवर्ग ने उपलब्ध करवाए थे। अमेरिका सरकार ने इस लेख के विरुद्ध अर्जी दायर की थी। जून 30, 1971 को अमेरिका अदालत के नौ सदस्यीय बैंच ने जो निर्णय दिया वह भारत में पत्रकारिता आचार संहिता और पॉलीटिक्स ऑफ सीक्रेसी के मुद्दे का लोकतांत्रिक भावनाओं के मद्देनजर एक सही और विश्लेषणात्मक उत्तर है। इसमें कहा गया था कि, जिस सच को सरकार छुपाना चाहती है उसे बेनकाब करके जनता के सामने लाना प्रेस की पहली जिम्मेदारी है। कूटनीति और सुरक्षा को लेकर रहस्यों को सामने लाना प्रेस का प्रथम दायित्व है। इसके लिए गोपनीयता की दुहाई नहीं दी जा सकती। हमारे देश में पत्रकारिता से जुडे़ लोगों को आए दिन जिस प्रकार की आलोचनाओं और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़ा एक गंभीर मसला है। अमेरिका में तो उन नागरिकों की सुरक्षा के लिए बकायदा विसिलब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट 1989 एक कानून बनाया गया है जो जनहित की गुप्त सूचनाएं देकर भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करते हैं मगर हमारे यहां दिनदहाड़े पुलिस और आपराधिक पृष्ठिभूमि के राजनेताओं द्वारा पत्रकारों और मीडिया के कार्यालयों पर हमले बोले जाते हैं। किसी भी तरह से मीडिया को सूली देने के मंसूबे राजनीति के उस चरित्र को दर्शाते हैं जिसे गंदा खेल कहते हैं। अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने कहा था-सरकार का अर्थ तर्क नहीं है और न ही बयान देने की कला है। यह मात्र शक्ति है।.. एक क्षण के लिए इसे गैर जिम्मेदाराना आचार-व्यवहार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में मीडिया की महत्ता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की खिल्ली उड़ाना क्या शोभनीय था? फिर भी मीडिया के सम्मान का स्वागत।
(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।) 




Thursday, February 23, 2012

क्या कारगर होगा पीएसजीए?


केके पनगोत्रा
जम्मू-कश्मीर में भ्रष्टाचार को कुंद करने के लिए जवाबदेही आयोग के सफल गठन और असफल नतीजों के बाद सत्ता के गलियारों और अफसरशाही की चकाचौंध से भरपूर मखमली कालीनों और वातानुकूल कक्षों की चमकदार मुलायम मेजों पर से आम जनता की खातिर एक बार फिर सरकारी प्रचार का शोरगुल उठा है। इस बार शासन-प्रशासन में बड़े मगरमच्छों पर कम निचले स्तर के कर्मचारियों पर सत्ता शीर्ष की नजरें तरेरी हैं। जनता फिर हर्षित है। अबकि बार सरकारी प्रचार की बानगी में गजब का जोश है। यह समझाने की कोशिश है कि देशव्यापी मोर्चे पर समाजसेवी अन्ना हजारे की आकांक्षाओं को जम्मू-कश्मीर सरकार ने सबसे पहले पूरा किया है। जवाबदेही आयोग के पंगु हो जाने और इस संस्था को जनता की मांग पर आधे-अधूरे मन से साल 2011 में पुन: बैसाखियों पर खड़ा तो कर दिया, मगर आयोग को स्वायत्त शक्ति संपन्न बनाने में सरकार ने खूब कंजूसी बरती है। क्यों? कारण और नीयत साफ है। सत्ता शीर्ष पर जमे राजनेताओं ने अपवाद को छोड़कर देश के किसी भी कोने में भ्रष्टाचार निरोधी कानून बनाते समय अपने गिरेबान को बचाने की हीलाहवाली की है। मजबूत लोकपाल और लोकायुक्त के गठन के पीछे इन्हीं कारणों और नीयत की मजबूरी नजर आ रही है। नि:संदेह जम्मू-कश्मीर का शासक वर्ग भी मजबूत लोकायुक्त से कन्नी काटता नजर आ रहा है। जवाबदेही आयोग का शिकंजा इतना मजबूत और कारगर ही नहीं था कि राज्य मंत्रिमंडल में दागियों का बाल बांका कर सकता। देश के दूसरे नंबर पर भ्रष्ट राज्य के तमगे को उतारने के लिए अब आम लोगों को पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट (पीएसजीए) का सहारा मिल रहा है। बेशक ऊपरी तौर पर यही लग रहा है कि अब जनता ही राजा है लेकिन बहुत प्रसन्न होने की भी जरूरत नहीं। पंजाब और हरियाणा की सरकारें भी ऐसा कानून बना चुकी हैं। देश में मध्य प्रदेश पहला ऐसा राज्य बन चुका है जिसने 18 अगस्त 2010 को इसी तर्ज का कानून बनाया है। ठीक इसके एक साल बाद जम्मू-कश्मीर ने अगस्त 2011 में पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट लागू किया। क्या इन राज्यों, विशेषत: मध्य प्रदेश जहां भ्रष्टाचार और पारदर्शिता संबंधी कानून देश में सबसे पहले लागू हुआ, को भ्रष्टाचार मुक्त कहा जा सकता है? पंजाब सरकार ठीक उसी तरह अपने राइट टू सर्विस एक्ट में 67 सेवाओं को अधिसूचित कर चुकी है। जैसे जम्मू-कश्मीर सरकार ने जनरल एडमिनिसट्रेशन डिपार्टमेंट (जीएडी) द्वारा जारी अधिसूचना नंबर जीएडी (एडीएम) 66/2011-5 में छह विभागों की कुल 45 सेवाओं को पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट में शामिल किया है। अब कुछ और सेवाओं को शामिल किया गया है। सेवा के लिए तय समय सीमा के संदर्भ में भी जम्मू-कश्मीर अन्य राज्यों से पीछे लगता है। मसलन हरियाणा में राशन कार्ड के लिए 15 दिन का समय है जबकि जम्मू-कश्मीर में 30 दिन है। इसी प्रकार इंतकाल और लर्निग ड्राइविंग लाइसेंस की समय सीमा हरियाणा में मात्र पांच दिन है जबकि जम्मू-कश्मीर में इन्हीं सेवाओं के लिए क्रमश: 30 और 15 दिन तय किए हैं। पंजाब सरकार ने राइट टू सर्विस एक्ट पर विधानसभा में विधेयक लाने से पहले एक अध्यादेश जारी करके राइट टू सर्विस एक्ट लागू किया था। देखा जाए तो इस लिहाज से सेवाओं की गारंटी देने में पंजाब अब भी जम्मू-कश्मीर से कहीं आगे है। सरकार के इस कदम को पंजाब में हो चुके विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने की रणनीति के रूप में भी देखा गया था। इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर में पीएसजीए को भी नेकां की तीन साल बाद सत्ता वापसी के लिए अग्रिम रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है कि राज्य में पीएसजीए के लागू होने से सरकारी कार्यालयों में फाइलों पर धूल नहीं जमेगी, मगर इसके परिणाम कैसे रहेंगे, इसे परखने के लिए थोड़ा इंतजार तो करना ही पड़ेगा। अक्सर यह देखा गया है कि कोई भी सरकार ऐसे कानून बनाते समय वोट बैंक को तो ध्यान में रखती है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, बशर्ते लोगों को ऐसे कानूनों का लाभ मिले। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में यही चिंता का विषय है। आखिर राज्य में भ्रष्टाचार निरोधी प्रचलित कानून इतने कमजोर भी नहीं थे और राज्य जवाबदेही आयोग का गठन एक सराहनीय कदम था, मगर फिर भी राज्य के गले से दूसरे नंबर के भ्रष्ट राज्य का टैग नहीं उतार सका। आम जनता की नब्ज टटोल कर देखें तो ऐसा लगता है कि गनीमत है किसी गैर सरकारी संस्था ने सर्वे नहीं किया। अगर ऐसा होता तो संभव है राज्य भ्रष्टाचार में एक पायदान ऊपर उठकर पहले पायदान पर होता। नि:संदेह देश के कुछ अन्य राज्यों की नकल पर पीएसजीए को एक मील का पत्थर कहा जा सकता है, मगर शातिर बाबूशाही और अफसरशाही क्या इसमें पलीता लगाने में कोई कसर नहीं रखेगी? आखिर वर्तमान में भ्रष्टाचार है क्या? भ्रष्ट तत्व इसे जनता का खून चूसने का एक नैसर्गिक अधिकार समझते हैं। जब देश में आरटीआई और जम्मू-कश्मीर में जवाबदेही आयोग गठित हुआ था तो ऐसा लगा था कि अब भ्रष्टाचारियों की खैर नहीं और व्यवस्था में पारदर्शिता आ जाएगी। भ्रष्टाचार के कारक तो पूरे देश में समान हैं। अब देखना यह है कि चतुर चालाक बाबूशाही और नौकरशाही, जिसे नेताशाही का संरक्षण प्राप्त होता है, राज्य में पीएसजीए का कैसे मुकाबला करती है? बहरहाल यह तो समय ही बताएगा कि पीएसजीए जम्मू-कश्मीर जैसे बड़े भ्रष्ट राज्य में कैसे और कितना कारगर साबित होता है। कुछ भी हो सरकार पर भरोसा करते हुए इस कदम का फिलवक्त स्वागत ही करना होगा और यह भी देखना होगा कि सरकार पीएसजीए को लागू करवाने में कितनी और कैसे गंभीरता का परिचय देती है या फिर समय के साथ इस बहुप्रचारित कानून की भी हवा निकल जाती है।
(लेखक जेएंडके के सामाजिक विषयों के अध्येता हैं)  

Sunday, February 5, 2012

मानसिकता का विरोध


केवल कृष्ण पनगोत्रा
 
विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय से संबंधित प्रसिद्ध कवि-लेखक और पंडितों के अंतरराष्ट्रीय संगठन पनुन कश्मीर के संयोजक डॉ. अग्निशेखर ने अपनी पुस्तक जवाहर टनल के लिए कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी की ओर से वर्ष 2010 के लिए मिलने वाले सर्वश्रेष्ठ पुस्तक अवार्ड को लेने से इंकार कर दिया है। इसे राज्य की वर्तमान और पूर्ववर्ती सरकारों के उस रवैये को लेकर नाराजगी की अलामत माना जा रहा है जिसके चलते विस्थापित पंडित समुदाय को अपने ही देश में विस्थापन की कठिनाइयों को झेलना पड़ रहा है। सबसे अहम यह है कि उनके इस निर्णय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी पुरानी मानसिकता को करारी चोट मिली है जिसका सीधा संबंध मात्र पंडित समुदाय ही नहीं बल्कि समूचे राज्य में व्याप्त राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बेचैनी से है। यह बेचैनी अब छिपी नहीं है। अब यह बेचैनी मात्र महसूस ही नहीं बल्कि नंगी आंखों से देखी भी जा सकती है। उनका यह कदम इस बेचैनी की सही समझ का प्रतिनिधित्व करता है। मैंने जवाहर टनल पढ़ी नहीं है फिर भी अग्निशेखर जी की विचारधारा, पंडित समुदाय के प्रति उनकी चिंताओं और राज्य के भारत से संबंधों पर समीचीन नजरिये से परिचित होने के कारण इतना अनुमान लगा सकता हूं कि इस पुस्तक का हृदय स्थल विस्थापन के घावों से रक्तरंजित जरूर होगा। राष्ट्रीय स्तर के कई हिंदी लेखकों ने डॉ. अग्निशेखर के निर्णय का समर्थन किया है। इस प्रकार का राष्ट्रीय समर्थन नि:संदेह उस मानसिकता का विरोध करता है जिसकी वजह से कश्मीर में भारत विरोध के बीज फूटे थे। यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष, संस्थान या राजनीतिक पार्टी को निशाना नहीं बनाता अपितु यह उस मानसिकता का विरोध करता है जिसने सबसे पहले अल फतह जैसे देश विरोधी संगठन पैदा किए और कश्मीर में राष्ट्रवादी धारा को कुंद करने की कोशिश की। एतिहासिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो 1947 के रक्तपात और उसके बाद की राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों ने राज्य में सांप्रदायिकता का बीज बोया। कश्मीर केंद्रित मानसिकता और धर्माधता के चलते ही 1990 तक कश्मीरी हिंदुओं को घाटी से पलायन करना पड़ा। 1947 के बाद जम्मू शरणार्थियों की पनाहगाह तो बना ही, शरणार्थियों ने जम्मू संभाग के मूल निवासियों के साथ मिलकर सियासी और सामाजिक संघर्ष लड़ना भी सीखा। 1931 तक जम्मू शांत था मगर उसके बाद की परिस्थितियों ने जम्मू को संघर्ष का केंद्र बना दिया। देखा जाए तो डॉ. अग्निशेखर की साहित्य वेदना और अकादमी सम्मान ठुकराना भी उसी निरंतर संघर्ष की एक कड़ी है जो आज तक अनवरत किसी न किसी रूप में जारी है। 1947 तक जम्मू संभाग की जनता भी राज्य के लिए स्वायत्तता की हामी भरती थी मगर अब परिस्थितियां बदल गई हैं। अब कश्मीर केंद्रित मानसिकता वाले लोग ही ऐसी मांगों के हामी हैं जिन्हें आए दिन बड़ी राजनैतिक चतुरता से पेश किया जाता है। हिंदुओं के साथ जम्मू के अधिकतर मुस्लिम भी संपूर्णत: भारत के साथ जुड़ाव के हामी हैं। राज्य के तीनों खित्तों में सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक असमानता और जम्मू व लद्दाख से भेदभाव के चलते जम्मू, लद्दाख और पश्चिमी पाकिस्तान एवं गुलाम कश्मीर के शरणार्थियों के साथ पंडित समुदाय ने मिलकर एक साझी विचारधारा को जन्म दिया है। यह विचारधारा अब स्थापित हो चुकी है और इस विचारधारा के मानने वालों का उद्देश्य कश्मीर केंद्रित मानसिकता से मुक्ति है। इस साक्षी विचारधारा को सुदृढ़ता देने के लिए डॉ. अग्निशेखर ने एक नवीन प्रयोग किया है। उनका क्षोभ मात्र विस्थापित पंडित समुदाय की मांगों की पैरवी नहीं करता अपितु सैद्धांतिक रूप से शरणार्थियों की अनदेखी और राज्य के दो खित्तों, जम्मू और लद्दाख के साथ निरंतर भेदभाव की मानसिकता पर भी एक बौद्धिक प्रहार है। जिस गैर मुस्लिम जनता ने कभी जिन हुकमरानों पर भरोसा किया था वह उस भरोसे को कायम रखने में असफल रहे हैं। भले ही शासक तबका जम्मू को अलग राज्य, लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश और पंडितों के लिए होमलैंड की मांगों को न माने मगर यह मांगें तार्किक जमीन पर खड़ी हैं। अपवादों को छोड़कर वादी ने हमेशा यह आभास करवाया है कि उच्की सच्ची और पूरी सहानुभूति भारत से नहीं बल्कि केंद्र से मन माफिक धनराशि के लिए भारत से अधूरा जुड़ाव प्रदर्शित करना मात्र है। 1947 के बाद जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच कोई मैच खेला गया तो वहां की अधिकतर मुस्लिम जनता ने पाकिस्तान का ही पक्ष लिया। यह कोई अनजानी खुराफातें नहीं हैं बल्कि एक सोचे समझे मनसूबे और खास मानसिकता की अलामत है। विशारत पीर की पुस्तक कफ्र्यू नाइट में ऐसी ही बातों का उल्लेख है जो कश्मीर सूबा की भारत विरोधी मानसिकता दर्शाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि विशारत पीर जैसे लोग अपनी पुस्तक के माध्यम से भारत विरोधी मानसिकता को प्रकट करने की कोशिश करते हैं जबकि अग्निशेखर अपनी पुस्तक पर मिलने वाले सम्मान को ठुकराकर उसी मानसिकता पर चोट करने का प्रयास कर रहे हैं जो भारत समर्थक पंडितों की विरोधी रही है। अग्निशेखर के निर्णय का समर्थन करने वालों में क्षमा कौल का नाम ही खुलकर सामने आया है मगर यह उतना ही खिन्न करने वाला है कि क्षमा के अतिरिक्त शायद ही जम्मू के किसी साहित्यकार ने खुलकर उनकी मुखरता का समर्थन किया है। दर्दपुर क्षमा जी का प्रसिद्ध उपन्यास है जिसमें विस्थापन के कारणों की विषमता को उभारा गया है। जिन लोगों ने इस उपन्यास को पढ़ा है वे कभी भी डॉ. अग्निशेखर के निर्णय को अनुचित नहीं ठहरा सकते। अग्निशेखर एक ऐसे प्रतिभा के धनी हैं जिन्होंने अपनी विलक्षण बौद्धिक क्षमता का उपयोग न सिर्फ कश्मीरी पंडित समुदाय बल्कि राज्य में राष्ट्रच्की सच्ची पैरवी और क्षेत्रीय भेदभाव के विरोध के लिए प्रत्येक पंथ और संप्रदाय के हर उस नागरिक के नाम कर दी जिसे भारत और भारतीयता से लगाव है।
(लेखक जेएंडके के सामाजिक विषयों के अध्येता हैं)  



Saturday, January 7, 2012

कठिन समय के संकेत

केवल कृष्ण पनगोत्रा 
नया साल जम्मू-कश्मीर की जनता, विशेषत: बेरोजगार युवाओं के लिए सामाजिक एवं आर्थिक लिहाज से बीते वर्ष की अपेक्षा ज्यादा कष्टदायक हो सकता है। ऐसे संकेत वर्ष 2011 में ही प्राप्त होना शुरू हो गए थे। दैनिक वेतन भोगियों, कांट्रेक्चुअल व स्थायी कर्मचारियों और अन्यत्र व्यवसायों से जुड़े लोगों ने बीते साल धरनों-प्रदर्शनों और हड़तालों के जरिए जैसी बेचैनी प्रदर्शित की उससे तो यही लग रहा था कि वर्ष 2012 में आम लोगों की कठिनाइयों में बढ़ोतरी होने वाली है। पिछले साल सरकार द्वारा जारी भर्ती नीति ने तो शिक्षित बेरोजगार युवाओं को उनके भविष्य और सामाजिक-आथिर्क जीवन की उम्मीदों को लेकर काफी निराश किया है। बेरोजगार युवा वर्ग के साथ आम जनता भी सरकार द्वारा घोषित नई रोजगार नीति से काफी क्षुब्ध है। महंगाई, मंदी-तंगी और खासकर राज्य में सुरसा की भांति मुंह फैलाए घूसखोरी एवं भ्रष्टाचार आम जनता के कई सपनों व आशाओं को निगल रहा है। राज्य में आतंकवाद और अलगाववाद से भी बड़ी समस्या वर्तमान में विकराल भ्रष्टाचार की है। जिनके एजेंडे में कभी भ्रष्टाचार शायद ही रहा वे भी आज भ्रष्टाचार को कोस रहे हैं। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में अलगाववादी नेता मीरवाइज मौलवी उमर फारूख ने भी कहा कि भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी समस्त बुराइयों की जड़ है। पूरी दुनिया में जो असंतोष है, उसका बड़ा कारण यह भ्रष्टाचार है। इसको मिटाना बहुत जरूरी है। हम सभी को इसमें सहयोग करना चाहिए। राज्य सरकार भी भ्रष्ट है। इसके खिलाफ एक ऐसा आंदोलन जरूरी है। अन्ना हजारे ने जो शुरुआत की है, उसकी कामयाबी के लिए हम दुआ करेंगे। नए साल में आम जनता और बेरोजगार क्या आशा कर सकते हैं? इस संदर्भ में केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को जो निर्देश दिए हैं उससे भविष्य की कष्टदायी आशंकाएं मूर्त रूप लेती नजर आ रही हैं। केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को कहा है एक अप्रैल, 2012 से शुरू होने वाली 12वीं पंचवर्षीय योजना और 2012 की वार्षिक योजना में केंद्र से सुरक्षित एवं उदार निधि (सिक्योर लिबरल फंडिंग) प्राप्त करने के लिए राज्य सरकार कर्मचारियों के वेतन और ऊर्जा खर्चो में कठोर उपाय करे। ऐसे समाचार प्राप्त हो रहे हैं कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय और योजना आयोग ने जम्मू-कश्मीर द्वारा सालाना 14500 करोड़ रुपये के वेतन खर्चो पर आपत्ति जताई है। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार ने राज्य की बिजली खरीद खर्च पर भी चिंता जताई है। गत वर्ष राज्य का बिजली खर्चा 2500 करोड़ था जो ऊर्जा दरों में बढ़ोतरी से 3000 करोड़ तक जाने की संभावना है। ज्ञात हो कि पिछले साल बिजली से राज्य को 800 से 900 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ, मगर सरकार इसे आने वाले वर्ष में दोगना करना चाहती है ताकि खर्च और प्राप्त राजस्व में घाटे के अंतर को पूरा किया जा सके। केंद्र ने वेतन खर्चो और बिजली खर्च को लेकर राज्य सरकार को जैसे तेवर दिखाए हैं उससे आम आदमी को ही कष्टदायक सामाजिक-आर्थिक सूरत-ए-हाल से गुजरना पडे़गा और रही सही कसर भ्रष्टाचार रूपी दानव निकाल देगा। केंद्र सरकार सरकारी खर्च में कटौती के पक्ष में यह दलील दे रही है कि जनसंख्या के लिहाज से जम्मू-कश्मीर से बड़े राज्य कर्मचारियों के वेतन पर कम खर्च कर रहे हैं। केंद्र सरकार इस संबंध में सुधार करने पर जोर दे रही है। दरअसल, राज्य सरकार की पिछले वर्ष जारी भर्ती नीति और बिजली किरायों में बढ़ोतरी को केंद्र सरकार के इसी दबाव की नजर से देखा जा सकता है। राज्य सरकार की नई रोजगार नीति और केंद्र द्वारा सुधारों की नसीहत वास्तव में केंद्र की 1990 में शुरू की गई आर्थिक नीतियों का ही परिणाम हैं। राज्य सरकार की जारी हुई रोजगार नीति जिसके तहत एक नवंबर, 2011 से सरकारी सेवा में आने वाले युवाओं को मूल वेतन का एक निश्चित भाग देना तय है, भी केंद्र की नई नीतियों से प्रभावित है। नि:संदेह शिक्षित बेरोजगार, आम जनता और किसी भी वर्ग एवं श्रेणी के सरकारी कर्मचारी नए साल में राज्य सरकार की नीतियों और भ्रष्टाचार पर प्रतीकात्मक कदमों से नाराज ही रहेंगे, मगर जनता यह भी आशा नहीं कर सकती कि सरकार वेतन खर्चो और बिजली किरायों को लेकर जनता की ओर झुकाव दिखाएगी। स्पष्ट हो रहा है कि केंद्र सरकार पूर्व की भांति अपनी जनविरोधी नीतियों को जारी रखेगी जिसका समान प्रभाव देश के अन्य राज्यों के साथ जम्मू-कश्मीर पर भी पड़ेगा। हालांकि राज्य सरकार ने केंद्र को बताया है कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के कारण वेतन खर्चो में बढ़ोतरी हुई है, मगर केंद्र किसी भी कीमत पर वेतन खर्चे में कटौती चाहती है। बेशक केंद्र सरकार ने सरकारी खर्चो पर राज्य सरकार पर दबाव बनाया है, मगर राज्य सरकार और राजनेताओं के चिरपरिचित स्वभाव से लगता है कि आने वाले समय में सुधारों की प्रक्रिया आम जनता की जेब पर ही भारी पड़ेगी। कारण, राज्य सरकार पूर्व में उठाए गए कठोर उपायों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार को यह विश्वास दिला रही है कि इस संबंध में वह शीघ्र ही इसी प्रकार के कठोर उपाय करेगी। नई रोजगार नीति, छठे वेतन आयोग की सिफारिशों संबंधी बकाए पर टालमटोल, बिजली किरायों की दरों में बढ़ोतरी जैसे कठोर उपाय पहले ही बेरोजगारों, आम जनता और सरकारी कर्मियों पर भारी पड़ रहे हैं। जब शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक भ्रष्टाचार पूरे यौवन पर है। जनता क्या करे? जनता के पास सिवाए संघर्ष और आंदोलन के कोई रास्ता नहीं। जम्मू-कश्मीर में भी तीव्र संघर्ष की जरूरत है। राजनेता अन्ना हजारे को चाहे जितना मर्जी कोसें, उनकी इस बात में दम है कि जब तक नाक नहीं दबाओगे, यह सरकार मुंह नहीं खोलती। राज्य में भ्रष्टाचार का आलम है कि अलगाववादियों की सियासी विचारधारा भले ही भारत विरोधी हो, भ्रष्टाचार पर वे भी अन्ना का समर्थन करते हैं। यानि पूरे देश में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी एक साझा मुद्दा है-धर्म और क्षेत्रवाद से परे।

(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)