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Saturday, April 14, 2012

शंका समाधान की जरूरत


दयासागर
ऐसा प्रतीत होता है कि तवी पुल के पास महाराजा हरि सिंह की मूर्ति दिल्ली वालों से पूछ रही हो कि मैंने तो भारतीय गणराज्य में अपने राज्य का विलय कर दिया था फिर यहां इतनी अशांति क्यों है? आज भी कुछ लोग किस कश्मीर समस्या की बात कर रहे हैं, जिसके बारे में मनमोहन सिंह और जरदारी के बीच बातचीत हो सकती है? महाराजा को क्या पता कि जिस गैर जिम्मेदाराना ढंग से केंद्र सरकार ने वीपी मेनन के हाथों भेजे गए विलय दस्तावेज का निपटारा किया था उससे वर्ष 1947 में भारत में विलय नहीं चाहने वालों को बातचीत करने का अवसर मिला था। इसके साथ ही न तो कांग्रेसी नेताओं ने अपनी कार्रवाई की सही तरह से व्याख्या करने की कोशिश की, जिस कारण देश विरोधी तत्व बेरोकटोक अपनी बातों को लोगों तक पहुंचाने में लगे रहे, जिस कारण कुछ लोगों के मन में शंकाएं उत्पन्न होती चली गई। यही नहीं, राजसत्ता के कुछ भूखे लोग भी केंद्र सरकार के ऐसे रवैये में अपना लाभ देखने लगे और आम कश्मीरियों को भ्रमों के जाल से निकालने के लिए ईमानदारी से कोशिश नहीं की।
महाराजा द्वारा हस्ताक्षरित विलय दस्तावेज एक चिट्ठी से ढंका हुआ था, जिसमें तत्कालीन मौजूदा शर्तों की व्याख्या की गई थी। 27 अक्टूबर 1947 को विलय दस्तावेज स्वीकारने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने भी महाराजा हरि सिंह को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें 26 अक्टूबर को उनकी लिखी चिट्ठी मिलने की बात कही गई थी। अलगाववादियों और देश विरोधी तत्वों ने विलय की पूर्णता के बारे में प्रश्न पूछने के लिए माउंटबेटन की चिट्ठी का सबसे अधिक प्रयोग किया है। कुछ लेखकों ने भी अंतिम विलय पर सवाल उठाने के लिए इस चिट्ठी का खूब प्रयोग किया है। यद्यपि यह चिट्ठी विलय दस्तावेज का हिस्सा नहीं थी। दिल्ली में सत्ता की कुर्सी पर काबिज लोगों को बहुत पहले इन सवालों के जवाब देने चाहिए थे। यहां तक कि महाराजा हरि सिंह की चिट्ठी के प्रारूप का भी अलगाववादियों के विचारों का विरोध करने के लिए प्रयोग नहीं हुआ है। हालांकि बहुत देर हो चुकी है, लेकिन अभी भी समय है।
जेएंडके (खासकर कश्मीर घाटी के लोगों) के कुछ मासूम लोगों के दिमाग में वर्षों से घर कर चुके भ्रमों को दूर करने के लिए सामान्य और व्यापक स्वीकार्य तर्कों को विस्तार देने की आवश्यकता है। भारतीय स्वतंत्रता कानून 1947 से संबंधित भारत सरकार कानून 1935 यह अवसर प्रदान करता है कि देश के किसी भी राज्य का शासक विलय दस्तावेज पर अमल कर भारतीय गणतंत्र में अपने राज्य का विलय कर सकता है।
महाराजा द्वारा हस्ताक्षरित विलय दस्तावेज के अनुसार- मैं श्रीमान् इंदर महेंदर राजराजेश्वर महाराजाधिराज श्री हरि सिंह, जम्मू और कश्मीर नरेश तत्था तिब्बत आदि देशाधिपति, जम्मू-कश्मीर का शासक अपने राज्य की संप्रभुता अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए राज्य को भारतीय गणराज्य में विलय करता हूं। साथ ही सूची में वर्णित शर्तों को स्वीकार करता हूं ताकि विधानमंडल राज्य के लिए कानून बना सके। भारतीय स्वतंत्रता कानून 1947 से विलय के दस्तावेज में किसी तरह का संशोधन या बदलाव नहीं होगा, जब तक कि मैं ऐसे संशोधनों को स्वीकार नहीं करता। मैं राज्य की ओर से विलय शर्तो को लागू करने की घोषणा करता हूं।
तत्कालीन गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया लॉर्ड माउंटबेटन ने इसे स्वीकार करते हुए 27 अक्टूबर 1947 को इस पर हस्ताक्षर कर दिया। उन्होंने कहा मैं 27 अक्टूबर 1947 के विलय के दस्तावेज को स्वीकार करता हूं। इसलिए तकनीकी रूप से यह विलय पूर्ण और असंदिग्ध है। यह उल्लेख करना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि जेएंडके राज्य के विलय दस्तावेज का प्रारूप देश के अन्य राज्यों के विलय दस्तावेज से भिन्न नहीं था।
हरि सिंह ने 26 अक्टूबर को अपनी चिट्ठी में विलय दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए 14 अगस्त 1947 के बाद देरी के कारणों का उल्लेख करने की कोशिश की है। महाराजा ने अपनी चिट्ठी में कहा है कि महामहिम मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि मेरे राज्य में एक गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। मैं आपकी सरकार से तत्काल मदद पहुंचाने का आग्रह करता हूं। महामहिम जैसा कि आप जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर राज्य का न तो भारतीय गणराज्य और न ही पाकिस्तान में विलय हुआ है। उत्तरी पश्चिमी सीमांत प्रांत के दूरस्थ क्षेत्रों से बड़ी संख्या में जनजातियों का घुसपैठ हो रहा है। ये मानसेहरा-मुजफ्फराबाद सड़क से बड़ी संख्या में ट्रकों में सवार होकर आ रहे हैं और आधुनिक हथियारों से पूरी तरह लैस हैं। उत्तरी पश्चिमी सीमांत प्रांत की स्थानीय और पाकिस्तान सरकार की जानकारी के बिना यह संभव नहीं है। बार-बार अपील करने के बावजूद इन हमलावरों को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
महाराजा ने राज्य के लोगों के बारे में जो कुछ कहा उससे बहुत कुछ खुलासा होता है। उन्होंने कहा कि मेरे राज्य के लोग जिसमें मुस्लिम, गैर मुस्लिम और सामान्य लोग शामिल हैं, उनका इसमें कोई हाथ नहीं है। मौजूदा आपातकालीन स्थिति को देखते हुए भारत सरकार से मदद मांगने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। इसी कारण मैंने ऐसा करने का फैसला किया है और आपकी सरकार हमारी बात को स्वीकार करे इसके लिए विलय के दस्तावेज को संलग्न करता हूं। इसलिए स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि महाराजा ने जेएंडके के राजकुमार के साथ मौजूदा परिस्थितियों का वैचारिक और तार्किक मूल्यांकन के बाद यह निर्णय लिया था। जबकि लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा महाराजा को लिखी चिट्ठी से तत्कालीन अनुत्तरित केंद्र सरकार और माउंटबेटन के इरादों का पता चलता है। तत्कालीन जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट ने उन अनुत्तरित प्रश्नों का स्पष्टीकरण देने तक की परवाह नहीं की।
लॉर्ड माउंटबेटन ने विचित्र ढंग से अपनी चिट्ठी में लिखा है कि परिस्थितियों को देखते हुए मेरी सरकार ने भारतीय गणराज्य में कश्मीर के विलय को स्वीकार करने का निर्णय लिया है। अगर किसी राज्य में विलय का मुद्दा विवाद का विषय रहा है तो उस राज्य के लोगों की इच्छाओं के अनुरूप विलय के सवाल पर फैसला लेना चाहिए। मेरी सरकार की इच्छा है कि कश्मीर में कानून व्यवस्था बहाल होने और यहां की धरती को हमलावरों से मुक्त करवाने के बाद राज्य के विलय के प्रश्न को लोगों के माध्यम से निपटाना चाहिए। सवाल है कि जेएंडके के विलय के मुद्दे पर माउंटबेटन का नाम विवाद के रूप में कैसे लिया जा सकता है। महाराजा ने किसी विवाद के बारे में बात नहीं की थी। न ही भारतीय स्वतंत्रता कानून को लेकर कोई विवाद था और न ही नेहरू ने इसकी व्याख्या की थी और न ही कांग्रेसियों ने उनका अनुसरण किया था।
(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)


Saturday, April 7, 2012

दोषपूर्ण बिजली शुल्क दर


दयासागर
क्या सार्वजनिक संस्थानों को आम आदमी को मिलने वाली सुविधाएं जैसे बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा व राजस्व का रिकार्ड रख कर बिना किसी जिम्मेदारी के उनके गैर निष्पादन कार्य को जारी रखने की अनुमति प्रदान करनी चाहिए? जम्मू-कश्मीर के वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने विधानसभा में इस शेर से बजट भाषण शुरू किया था कि तेज हवा से डरने वाले, साहिल पर ही डूब गए। तूफान से लड़ने वालों ने, मंजिल अपनी पाई है। यह सिर्फ उन लोगों के लिए सही है जो सफलता प्राप्त करने के लिए बड़ी निडरता से मुसीबतों का सामना करने को तैयार रहते हैं। जेएंडके में बिजली आपूर्ति प्रबंधन की कहानी इससे भिन्न मालूम नहीं होती है। जेएंडके के वित्त मंत्री द्वारा विधानसभा में जो बातें कही गई उसके अनुसार, वर्ष 2011-12 के लिए बिजली खरीदारी बिल लगभग 3000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, लेकिन पीडीडी 1100 से 1200 करोड़ रुपये से अधिक संग्रह नहीं कर सकेगा। पहले बिजली खरीदारी बजट 2400 करोड़ रुपये था जो बढ़कर 3000 करोड़ रुपये हो गया। पहले वर्ष 2011-12 के लिए बिक्री राजस्व संग्रह लक्ष्य 1415 करोड़ रुपये रखा गया था, लेकिन करीब 1200 करोड़ रुपये डूबने का अनुमान है। वर्ष 2012-13 के लिए बिजली खरीदारी की अनुमानित राशि 3100 करोड़ रुपये है, जबकि बिक्री राजस्व लक्ष्य सिर्फ 1732 करोड़ रुपये रखा गया है। इतना बड़ा घाटा इस कारण नहीं है कि आम आदमी और इंडस्ट्री को सरकार बिजली पर बड़ी सब्सिडी देती है। यह इसलिए है कि सरकार बिजली विभाग को उसके गैर निष्पादन और अक्षमता के लिए एक बड़ा अनुदान देती रही है। पीडीडी द्वारा जेएंडके स्टेट इलेक्टि्रसिटी रेगुलेटरी कमीशन (जेकेएसइआरसी) को सौंपे गए आंकड़ों से साफ है कि इतना कम बिजली बिक्री संग्रह अनुचित रूप से बिजली आपूर्ति पर सब्सिडी शुल्क दर के कारण नहीं बल्कि 1. पीडीडी द्वारा अनुचित ढंग से टांसमिशन एंड डिस्टि्रब्यूशन (टीएंडडी) घाटा को परिलक्षित करना है 2. बड़ी संख्या में बिजली कनेक्शन का पंजीकरण न होना 3. बुनियादी संरचनाओं का गलत प्रबंधन और असंगत उच्च स्थापना दर 4. दोषपूर्ण शुल्क दर संरचना जिससे निष्ठावान उपभोक्ता हतोत्साहित हुए हैं 5. मीटर कनेक्शनों के लिए गलत न्यूनतम दर रखा गया है जो कि ईमानदार उपभोक्ताओं को कांट्रैक्ट भार बढ़ाने के लिए हतोत्साहित करता है और वितरण लाइन पर वास्तविक कनेक्शन लोड का आकलन करने के लिए विभाग की राह में आना है। जेकेएसइआरसी के समक्ष डेवलपमेंट कमिश्नर ऑफ पावर द्वारा दायर की गई बिजली शुल्क दर की पुनर्समीक्षा याचिका में वर्ष 2010-11 के लिए घरेलू बिजली कनेक्शन को 10.85 लाख (5,26073 मीटर वाले और 5,59342 बिना मीटर वाले) दिखाया गया है। वर्ष 2011-12 के लिए 11.19 लाख (7,19875 मीटर वाले और 3,99,697 बिना मीटर वाले) और वर्ष 2012-13 के लिए 11.41 लाख (10,21,433 मीटर वाले और 1,19,908 बिना मीटर वाले) प्रस्तावित है। बिजली विभाग ने 120 लाख से ऊपर जनसंख्या वाले जेएंडके राज्य के लिए वर्ष 2012-13 में सिर्फ 11.41 लाख उपभोक्ताओं का अनुमान बताया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि जेएंडके में एक परिवार में 10 लोग हैं, जो यकीनन गलत है और यह दिखाता है कि राज्य में आधा से ज्यादा परिवार बिना बिजली के रहता है, जिसे नहीं माना जा सकता। वर्ष 2010-11 के लिए गैर घरेलू/कॉमर्शियल कनेक्शन 1.46 लाख (75,719 मीटर वाले और 70,124 बिना मीटर वाले) दिखाया गया है। वर्ष 2011-12 के लिए 1.49 लाख (105,592 मीटर वाले और 43,339 बिना मीटर वाले) और वर्ष 2012-13 के लिए 1.5 लाख (1,24,176 मीटर वाले और 26,004 बिना मीटर वाले) है। जेएंडके पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट (जेकेपीडीडी) ने 12 दिसंबर 2011 को जेकेएसइआरसी के समक्ष वर्ष 2012-13 के लिए वार्षिक राजस्व मांगों पर सहमति बनाने के लिए एक याचिका सौंपी थी। वर्ष 2011-12 के लिए 3991.20 करोड़ रुपये के रूप में संशोधित वार्षिक राजस्व आंकड़े का उल्लेख किया गया है। वर्ष 2012-13 के लिए वार्षिक राजस्व जरूरत के लिए अनुमानित राशि 4,105 करोड़ रुपये है। 3 जनवरी 2012 को एक दूसरी याचिका में पीडीडी ने मांग की है कि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए जहां मीटर लगे हैं वहां बिजली किराये में 23 प्रतिशत की वृद्धि की जाए और जहां नहीं लगे हैं वहां 35 प्रतिशत किराया बढ़ाया जाए। इसी प्रकार कॉमर्शियल गैर घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 21 प्रतिशत (मीटर वाले) और 31 प्रतिशत (बिना मीटर वाले) किराया वृद्धि की मांग की गई है। इसके साथ ही राज्य के लिए टीएंडडी घाटा वित्त वर्ष 2010-11 के लिए 60.55 प्रतिशत अनुमानित है और वर्ष 2011-12 के लिए 56.76 प्रतिशत। पिछले वर्षो में कार्य निष्पादन को देखते हुए सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है क्योंकि ताज मोहिउद्दीन जो कि उमर सरकार में एक वरिष्ठ मंत्री हैं, ने फरवरी में एक स्थानीय टीवी पर विचार विमर्श करते हुए कहा था कि जेएंडके में पीडीडी का टीएंडडी घाटा 70 प्रतिशत के करीब है। हो सकता है वह प्रमाणित आंकड़े नहीं बताए हों पर यकीनन तथ्यों के नजदीक ही होंगे। वर्ष 2011-12 की याचिका पर नजर डाली जाए तो पीडीडी के आंकड़ों में विरोधाभास ही नजर आता है। बिजली विभाग का खराब निष्पादन किसी से छुपा नहीं है। पर लगता है कि सरकार ने मान लिया है कि बिजली विभाग में सुधार नहीं हो सकता। अगर ऐसा नहीं होता तो पीडीडी की याचिका में बिक्री राजस्व आंकड़े, टीएंडी घाटा और वर्ष 2012-13 में बिजली किराये में बढ़ोतरी की मांग सरकार में बैठे किसी भी तार्किक सोच वाले व्यक्ति खासकर वित्त मंत्री को विचलित कर देता, लेकिन 5 मार्च को वित्त मंत्री की बजट और उसके बाद सदन में चर्चा के समय ऐसा कुछ नहीं हुआ। हां, 10 मार्च को बजट पर चर्चा करते हुए राथर साहब ने राज्य विधानसभा को यह सूचना जरूर दी कि जेएंडके सरकार ने 1 अप्रैल 2012 से इनर्जी अकाउंटिंग सिस्टम प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। इस नई पद्धति में यह लक्ष्य रखा गया है कि जो बिल उपभोक्ताओं पर पीडीडी का भार डालेगा उनमें दिखाई गई बिजली खपत का प्रतिबिंब वितरण ट्रांसफार्मर के साथ लगे हुए मीटर में भी दिखना चाहिए। यकीनन इस बात की जरूरत इसलिए समझी गई है क्योंकि बिजली के तारों में से बिजली की दो तिहाई भाग पीडीडी विभाग टीएंडडी घाटा दिखा रहा है। पर इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि आज तक घाटा कम करने के सभी दावे जेएंडके स्टेट इलेक्टि्रसिटी रेगुलेटरी अथॉरिटी (1 जून 2006) बनने के बाद भी पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
(लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं)

Tuesday, March 27, 2012

बजट में भी निष्पक्षता का अभाव


दयासागर
वर्ष 2012-13 का बजट पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और जेएंडके के वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने यह संदेश देने की कोशिश की कि यह बिना घाटे का बजट है। बजट को लेकर आज आम आदमी उतना उत्सुक दिखाई नहीं देता जितना 10-12 साल पहले दिखता था। लगता है कि आज यह धारणा बन गई है कि बजट बनाना और उस पर बहस करना और फिर पास कराना सत्ता पक्ष के लोगों का काम है। अगर कोई विवाद होता है तो उसका तब तक कोई अर्थ नहीं होता जब तक सत्ता पक्ष की ओर से कोई विवाद न हो। संसद में जिस तरह रेल बजट पेश हुआ और रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बाहर का रास्ता दिखाया गया वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अनोखी बात है। इससे यह संकेत मिलता है कि आज देश की राजनीति सिर्फ संख्याओं का खेल बनकर रह गई है। आम आदमी रोटी, कपड़ा और मकान की समस्याओं के कारण इतना हतोत्साहित हो गया है कि उसने भ्रष्ट राजनीति से छुटकारा पाने की निकट भविष्य में आस ही छोड़ दी है। आर्थिक सर्वे 2011-12 में मुद्रास्फीति दर 9.1 फीसदी दिखाया गया है। इसका भार आम आदमी पर पड़ता है। सरकारी मुलाजिम इसको झेल लेता है, क्योंकि सरकार हर साल औसतन अपने मुलाजिमों को 10 फीसदी से ज्यादा महंगाई भत्ता देती है। वर्ष 2012-13 की बजट में कोई ऐसी बात नहीं है कि कीमतें घटने की संभावना दिखाई दे। इसके बावजूद प्रणब मुखर्जी इस बजट को आम आदमी का बजट मानते हैं, जिसमें विधवाओं और विकलांगों का पेंशन 200 रुपये से बढ़ाकर सिर्फ 300 रुपये प्रतिमाह किया गया है। अब मनमोहन सिंह ही बता सकते हैं कि कैसे कोई 300 रुपये माहवार लेकर जी सकता है। कार्यपालिका में बैठे अधिकांश लोग भ्रष्ट व्यवस्था से उतने चिंतित दिखाई नहीं देते। कारण, बढ़ती महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं (शिक्षा, स्वास्थ्य) के गिरते स्तर का उन पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि वेतनमान बढ़ने से उनको आम आदमी के मुकाबले कम बोझ उठाना पड़ता है। फैक्टरियों और निजी क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों को किस तरह लताड़ा जा रहा है यह इस बात से सिद्ध हो जाता है कि जहां एक तरफ सरकारी कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ता अविलंब बढ़ाया जाता है, वहीं केंद्रीय बजट पेश करने के कुछ दिन पहले इंप्लाइज कांट्रिब्यूटरी फंड पर सरकार ने 2011-12 के लिए ब्याज दर 9.5 फीसदी से घटा कर 8.25 फीसदी कर दिया है। श्रमिक वर्ग के हित में केंद्रीय और राज्य के बजट में कुछ खास नहीं कहा गया है। व्यापारी वर्ग को टैक्स में छूट, कुछ समय तक एक्साइज में छूट, निवेश पर सब्सिडी या ऐसे ही अन्य प्रावधानों में कोई बुराई नहीं है लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि क्या व्यापारी वर्ग इसका कुछ लाभ अपने कर्मचारियों/कामगारों को दे रहा है या नहीं। पर ऐसा बहुत कम होता है। अब्दुल रहीम राथर ने वर्ष 2012-13 के बजट में निजी क्षेत्र के अस्पतालों, नर्सिग घरों और प्रयोगशालाओं को टैक्स में कुछ छूट देते हुए कहा है कि यदि इसका लाभ स्वास्थ्य सेवा लेने वालों तक नहीं पहुंचा तो सरकार ऐसी छूट वापस भी ले सकती है। राथर का यह कदम सराहनीय है, लेकिन यदि वह यह बात उद्योगों और दूसरे व्यापारिक संस्थानों के लिए भी कहते तो अच्छा होता। राजनीति के खिलाडि़यों का काम उत्तर प्रदेश में हुए चुनावों के बाद साफ नजर आने लगा है। पहले मुलायम सिंह और मायावती की पार्टियां कांग्रेस के खिलाफ प्रचार कर रही थीं और अब बसपा और सपा में कांग्रेस का साथ देने के लिए होड़ मची हुई है। इससे साफ है कि आज राजनीतिज्ञ मतदाता को सीधा-सादा समझते हैं। कोई भी निर्णय देश और आम मतदाता के हित में कम और कुर्सी पर बैठे लोगों के हित में ज्यादा लिया जाता है। हाल ही में श्रीलंका के विषय में करुणानिधि का दबाव और रेल मंत्री को बदलने की ममता की मांग से यह बात स्पष्ट हो जाती है।हमारे देश में सरकारी विश्वविद्यालयों में कार्यरत प्रोफेसरों को राजनीति में भाग लेने या सरकार की नीतियों पर टिप्पणी करने की छूट दी गई है, जबकि दूसरे कर्मचारियों को यह छूट नहीं है। इसके पीछे यह कारण है कि बुद्धिजीवी और उच्च सोच रखने वाले लोग समय-समय पर राजनेताओं को दिशा-निर्देश देते हैं, पर यहां भी उतनी दयानतदारी नहीं रही है। शिक्षा क्षेत्र के लोगों में भी सरकारी पदों पर आसीन लोगों की शाबाशी पाने की होड़ मची रहती है। यदि ऐसा न होता तो सरकार द्वारा वर्ष 2011-12 की जो आर्थिक सर्वे जारी की गई है, उस पर कुछ लोग जरूर सवाल उठाते। वर्ष 2011 के मुकाबले 2011-12 में कृषि उत्पादन/खाद्यान्न सिर्फ 2.29 फीसदी (24.48 से 25.04 करोड़ टन) बढ़ेगा, जबकि जनसंख्या 3.4 फीसदी बढ़ेगी (117 से 121 करोड़)। फिर भी दूसरी हरित क्रांति के लिए 2012-13 की बजट में कृषि क्षेत्र के लिए सिर्फ 5000 करोड़ रुपये रख कर ही बड़े दावे किए जा रहे हैं। विदेशों से गत वर्ष पहले छह माह में ही आयात मूल्य 236.67 अरब अमेरिकी डॉलर, जबकि निर्यात सिर्फ 150.9 अरब अमेरिकी डॉलर था। अनुमान के मुताबिक वर्ष 2011-12 में आयात-निर्यात का अंतर करीब सात लाख करोड़ रुपये होगा। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था मापने के लिए आयात-निर्यात का घाटा/लाभ एक अच्छा मूल्यांकन होता है। कुछ लोगों का तर्क है कि कच्चे तेल का आयात घाटे का मूल कारण है। यह तर्क सही नहीं है। अमेरिका भी बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और उसे साफ कर बेचता है। अमेरिका में एक मजदूर भारत के मुकाबले ज्यादा मजदूरी लेता है। फिर भी अमेरिका में आम आदमी को पेट्रोल भारत के मुकाबले 20 से 25 रुपये लीटर कम मिलता है। इससे साफ है कि भारत में सरकार तेल पर ड्यूटी और टैक्स बहुत अधिक लेती है। आम आदमी को विचार करना होगा कि भ्रष्ट अधिकारी और नेता जिस सरकारी दान का दुरुपयोग करते हैं, वह उसका ही है और जो उसको सब्सिडी दी जाती है उससे कहीं अधिक उससे टैक्स लिया जाता है। आर्थिक सर्वे के मुताबिक जल्द ही सरकार के ऊपर देश-विदेश का कर्ज 50,00,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। वर्ष 2011-12 में सरकार ने 2,67,986 करोड़ रुपये सूद दिया है। यूपीए-2 की 2012-13 बजट में भी 14,90,925 करोड़ रुपये का बजट खर्च करने के लिए 4,79,000 करोड़ रुपये का उधार लेने का लक्ष्य रखा गया है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की आज घर-घर में चर्चा हो रही है, पर सत्ता की दौड़ में शामिल राजनेताओं पर आम आदमी कैसे अंकुश लगाता है यह देखने में अभी समय लगेगा।
(लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं)

Sunday, February 5, 2012

पेंशन का असहनीय बोझ


दयासागर
वर्ष 2003 के बाद नियुक्त सरकारी कर्मियों के लिए केंद्र ने सेवानिवृत्त पेंशन योजना बंद कर दिया है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने भी वर्ष 2009 के बाद नियुक्त कर्मियों के साथ ऐसा ही किया है। नि:संदेह सहयोगात्मक प्रोविडेंट फंड (सीपीएफ) जैसी योजनाएं गैर पेंशनधारी कर्मचारियों के लिए लागू होंगी। लेकिन सेवानिवृत्त पेंशन के पहले के प्रावधानों के लिए सीपीएफ कोई समतुल्य स्थानापन्न नहीं है। स्थिति यह है कि एक सरकारी कर्मचारी को प्रतिमाह 40000 रुपये पेंशन मिल रहा है। (पेंशन पर महंगाई भत्ता भी मिलता है और ग्रेड संशोधन के साथ पेंशन को भी संशोधित किया जाता है)। यह किसी व्यक्ति द्वारा बैंक में 50 लाख से अधिक की धनराशि निश्चित समयसीमा तक जमा करने के बाद प्रतिमाह सूद प्राप्त करने की तरह है। क्या सीपीएफ योजना इससे मेल खाती है? कभी नहीं, इसके बावजूद सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए लोग लालायित रहते हैं। फलस्वरूप बड़ी संख्या में शिक्षित युवा बेरोजगार हैं। कोई भी सरकारी कर्मचारी संघ या एसोसिएशन पेंशन न देने की नई नीति के विरोध में उद्वेलित नहीं हुआ है। इसका जवाब इस तथ्य में निहित है कि कर्मचारी संघ/एसोसिएशनके बदले वर्ष 2010 (जेएंडके में) से पहले नियुक्त लोग इसका संचालन करते हैं और इसका लाभ भी उठा रहे हैं। यह उद्धृत किया जा सकता है कि केंद्र सरकार के कर्मचारी जो वर्ष 2030 या उसके बाद सेवानिवृत्त होंगे, उन्हें पेंशन का लाभ मिलेगा। वर्ष 2004 के बाद सरकारी सेवारत युवा जो हतोत्साहित होकर नौकरी खोज रहे थे, पेंशन के विवादों में पड़ने के बारे में नहीं सोच सकते। जबकि नव नियुक्त, कांट्रैक्चुअल, कनसॉलिडेट पे, डेलीवेजरों और कैजुअल कर्मचारी बड़े पैमाने पर रैलियां निकालते हैं। नियमित कर्मचारियों के नेतृत्व में कर्मचारी संघों द्वारा इनके प्रदर्शनों को संचालित किया जाता है। राजनीतिज्ञों के साथ-साथ सरकारी सेवारत वरिष्ठ कर्मचारियों पर भी बेरोजगार युवाओं का शोषण करने का आरोप लगता है। एक व्यक्ति जो हाल ही में सरकारी सेवा में शामिल हुआ है, जब उससे पूछा जाता है कि क्या भर्ती किए गए नए नियमित कर्मचारियों (जो वर्ष 2003 के बाद केंद्र सरकार और 2009 के बाद जेएंडके सरकार), कांट्रैक्चुअल, कंसालिडेटेड पे कर्मचारियों, डेलीवेजरों और कैजुअल कर्मचारियों का अलग-अलग एसोसिएशन है? इस बारे में वह कुछ तर्क दे सकता है। सरकारी नौकरियों की आकांक्षा रखने वाले बेरोजगारों की चिंता बढ़ाते हुए कर्मचारी केंद्र सरकार से सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 वर्ष करने और राज्य सरकार के कुछ कर्मचारी सेवानिवृत्ति की आयु 58 से 60 वर्ष करने की मांग उठा रहे हैं। निश्चित रूप से इससे सरकारी विभागों में उपलब्ध सीमित नौकरियों के अवसर कम होंगे। नि:संदेह सरकारी कर्मचारी जो पहले से नौकरी कर रहे हैं, सभी संभावित संसाधनों का उपयोग करेंगे और बढ़ी हुई सेवानिवृत्ति आयु को प्रभावित करेंगे। कारण, वे नीति योजना में भी शामिल हैं। लेकिन जब देश में शिक्षित/उच्च शिक्षा प्राप्त बेरोजगारों की भरमार है तो ऐसे में सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाना कहां तक न्यायोचित है, क्योंकि सरकार के पास संसाधनों की कमी है। यदि सेवानिवृत्ति आयु नहीं बढ़ाई जाती है तो पदों के निर्माण की नियमित प्रक्रिया पर ब्रेक नहीं लगेगा। नव नियुक्त कर्मचारियों के वेतन और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पेंशन भुगतान के बाद भी सरकार पर उतना बोझ नहीं पड़ेगा। यद्यपि आइएएस/ आइपीएस/ आइएफएस/आइआरएस और स्थानीय सेवा में जुटे लोग समयबद्ध पदोन्नति मिलने से अपने करियर में ठहराव महसूस नहीं करते हैं लेकिन आम सेवाओं में लगे लोग अनावश्यक ठहराव का सामना करते हैं। इसलिए यदि सेवानिवृत्ति की आयु नहीं बढ़ाई जाती है तो ऐसे कर्मचारियों को भी पदोन्नति मिलेगी और वे प्रोत्साहित होंगे। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जटिल प्रक्रिया के कारण गैर निष्पादन/ अयोग्य/भ्रष्टसरकारी कर्मचारियों को दंडित करना या उससे मुक्ति पाना बहुत कठिन है। जेएंडके के मुख्यमंत्रियों ने भी कई अवसरों पर उद्धृत किया है कि उन्होंने भ्रष्ट तत्वों से मुक्त होने की योजना बनाई है, लेकिन वे इसमें सफल नहीं हुए। इसलिए यदि सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई जाती है तो अवांछित कर्मियों को भी परोक्ष रूप से विस्तार मिलेगा। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि सेवानिवृत्ति की आयु दो वर्षो के लिए बढ़ाई जाती है तो जीपीएफ का भुगतान, नकद भुगतान को छोड़ दें तो सरकार दो वर्षो तक पेंशन और ग्रेच्युटी देने से इंकार कर देगी। सेवानिवृत्ति आयु बढ़ने पर नकारात्मक प्रभावों के सामने ऐसे तर्क कहीं नहीं टिकते हैं जैसे-1. विस्तृत सेवा अवधि के दौरान वेतन में बढ़ोतरी 2. सेवानिवृत्ति पर पेंशन में भी बढ़ोतरी 3. सरकार को अतिरिक्त खर्च करने पर दो वर्षो से भी अधिक समय तक वृद्ध और बीमार कर्मचारियों का निर्वहन 4. कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण विभागों में बहुत कम युवाओं का कार्यरत होना आदि शामिल है। इसलिए सेवानिवृत्ति की आयु कम करने के बजाय इसे बढ़ाने पर विचार करने की जरूरत है। बेहतर होगा कि पेंशन के लिए 20 वर्षो की समयसीमा के साथ नियमित सेवानिवृत्ति की आयु कम कर 55 वर्ष करने के प्रस्तावों पर विचार किया जाए। अभी भी यह प्रावधान रखा जा सकता है, अगर कुछ कर्मचारी असाधारण कर्तव्यनिष्ठ, अनुभवी, योग्य और स्वस्थ हों तो 55 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद दो वर्षो के लिए उन्हें सेवा विस्तार देने पर विचार किया जा सकता है। इससे कोई नुकसान नहीं होगा यदि अपवाद स्वरूप मामलों में 65 वर्ष की उम्र तक सेवा विस्तार की पुनरावृत्ति होती है। इस प्रकार 1. सरकार को अयोग्य तत्वों से मुक्ति मिलेगी 2. सरकारी नौकरियों में बेरोजगार युवाओं के लिए प्रवेश बाधित नहीं होगा 3. राजकोष पर वेतन का भार कम पड़ेगा। सरकार को भी चाहिए कि वह वर्ष 2003 के बाद नियुक्त लोगों के लिए सेवानिवृत्ति पेंशन बहाल करने पर विचार करे, क्योंकि सेवा संचालित नियमों जिनका सरकारी कर्मचारियों को अनुसरण करना होता है, प्राइवेट इंटरप्राइज/बिजनेस हाउस में किसी के काम करने की तुलना में अधिक कठोर है। सरकारी कर्मचारियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राइवेट इंटरप्राइज की अनुमति नहीं दी जा सकती है। सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के शोषण और अन्याय की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सरकारी नौकरियों के लिए भर्ती प्रक्रिया में काफी विलंब हो चुका है।
(लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)