Tuesday, February 7, 2012

विधानसभा सत्र गर्माने को तैयार है भाजपा


जम्मू। स्थानीय निकाय चुनाव की तैयारी कर रही भाजपा 23 फरवरी से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में उठने वाले अहम मुद्दों को लेकर सड़कों पर भी आंदोलन करेगी। सदन में गर्माने वाले मुद्दों को लोगों के बीच भी जोर शोर से उठाया जाएगा। यह रणनीति भाजपा के राज्य प्रभारी प्रो. जगदीश मुखी के नेतृत्व में सोमवार को यहां कोर ग्रुप, विधायकों व वरिष्ठ नेताओं से पार्टी मुख्यालय में हुई तीन अलग अलग बैठकों मे बनी। इस दौरान अप्रैल में प्रस्तावित निकाय चुनाव को लेकर की जा रही तैयारियों पर भी चर्चा हुई। एक दिवसीय जम्मू दौरे के दौरान राज्य प्रभारी ने कोर ग्रुप की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष शमशेर सिंह व राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य डॉ. निर्मल सिंह, अशोक खजूरिया, डॉ. जितेंद्र सिंह, विधायक दल के नेता जुगल किशोर, उपाध्यक्ष चंद्र प्रकाश गंगा, महासचिव सत शर्मा व उषा चौधरी से बैठक की। बैठक में विधानसभा के बजट सत्र में पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों के साथ जम्मू में अपना मेयर बनाने के लिए अपनाई जा रही रणनीति पर विचार किया गया। प्रदेश पदाधिकारियों, वरिष्ठ नेताओं, जिला प्रधानों व मोर्चा प्रभारियों से हुई दूसरी बैठक में नेताओं को लोगों के मसलों को जोर शोर से उठाने के लिए कहा गया। 

क्रॉस-वोटिंग से उपजे हालात का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता पार्टी उम्मीदवारों को कामयाब बनाकर साबित करें कि पार्टी हर लिहाज से मजबूत है। सभी जिला इकाइयां महीने के एक ही दिन बैठक करने का फैसला करें। इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष ने जोर दिया कि जिलों में पार्टी की गतिविधियों को संचालित करने के लिए जिला मुख्यालयों में अच्छे पार्टी कार्यालय बनाए जाएं। वहीं विधायकों से बैठक में विधानसभा सत्र की रणनीति बनाई गई और पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों पर भी चर्चा हुई। विधायक अशोक खजूरिया, जुगल किशोर, सुखनंदन चौधरी व शाम चौधरी के साथ शमशेर सिंह मन्हास भी बैठक में मौजूद थे। बैठकों में बाली भगत, सोमराज खजूरिया, सोफी यूसुफ, कर्नल उत्तम सिंह, सत शर्मा, चंद्र मोहन शर्मा, कवींद्र गुप्ता, हरींद्र गुप्ता, युद्धवीर सेठी, ममता शर्मा, शिल्पी वर्मा, सुनील शर्मा, पवन खजूरिया, बलवीर राम, बंसी लाल भारती, सकीना बानो, मुनीष शर्मा, कर्ण सिंह, सुभाष भगत, राजेश गुप्ता व अन्य मौजूद थे।

पुनर्गठन से ही खत्म हो सकती है अनदेखी


जम्मू। राज्य के पुनर्गठन की मांग दोहराते हुए जम्मू स्टेट मोर्चा ने केंद्र व राज्य सरकार पर जम्मू संभाग के साथ भेदभाव का आरोप लगाया है। मोर्चा के प्रधान प्रो. वीरेंद्र गुप्ता ने सरकार के तीनों संभागों के बराबर विकास के दावों को जम्मूवासियों के साथ कोरा मजाक बताया। उन्होंने कहा है कि सरकार समानता की बड़ी-बड़ी बातें तो करती है, लेकिन स्थिति विपरीत है। गुप्ता ने कहा है कि केंद्र सरकार ने डल झील के संरक्षण व साफ-सफाई के लिए 386 करोड़ की राशि जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि सरकार को जम्मू के पर्यटन स्थलों की फिक्र नहीं है। 

हकीकत तो यह है कि पिछले वर्ष कश्मीर में करीब दो लाख ही पर्यटकों का आगमन रहा है, जबकि जम्मू में माता वैष्णों देवी की यात्रा के लिए ही एक करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं का जम्मू में पिछले वर्ष आना हुआ है। गुप्ता ने जम्मू में पार्टी के कार्यकर्ताओं की बैठक में कहा कि हाल ही में सूचना विभाग में हुई असिस्टेंट इंफारमेशन ऑफिसर की नियुक्तियों में भी किसी भी जम्मूवासी को जगह नहीं मिली है। वहीं पर जम्मू संभाग के बर्फबारी से प्रभावित डोडा, किश्तवाड़ व रामबन के जिलों में लोगों को अभी तक मुआवजा ही नहीं मिल पाया है। 

(07 फरवरी, दैनिक जागरण)

Sunday, February 5, 2012

मानसिकता का विरोध


केवल कृष्ण पनगोत्रा
 
विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय से संबंधित प्रसिद्ध कवि-लेखक और पंडितों के अंतरराष्ट्रीय संगठन पनुन कश्मीर के संयोजक डॉ. अग्निशेखर ने अपनी पुस्तक जवाहर टनल के लिए कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी की ओर से वर्ष 2010 के लिए मिलने वाले सर्वश्रेष्ठ पुस्तक अवार्ड को लेने से इंकार कर दिया है। इसे राज्य की वर्तमान और पूर्ववर्ती सरकारों के उस रवैये को लेकर नाराजगी की अलामत माना जा रहा है जिसके चलते विस्थापित पंडित समुदाय को अपने ही देश में विस्थापन की कठिनाइयों को झेलना पड़ रहा है। सबसे अहम यह है कि उनके इस निर्णय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी पुरानी मानसिकता को करारी चोट मिली है जिसका सीधा संबंध मात्र पंडित समुदाय ही नहीं बल्कि समूचे राज्य में व्याप्त राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बेचैनी से है। यह बेचैनी अब छिपी नहीं है। अब यह बेचैनी मात्र महसूस ही नहीं बल्कि नंगी आंखों से देखी भी जा सकती है। उनका यह कदम इस बेचैनी की सही समझ का प्रतिनिधित्व करता है। मैंने जवाहर टनल पढ़ी नहीं है फिर भी अग्निशेखर जी की विचारधारा, पंडित समुदाय के प्रति उनकी चिंताओं और राज्य के भारत से संबंधों पर समीचीन नजरिये से परिचित होने के कारण इतना अनुमान लगा सकता हूं कि इस पुस्तक का हृदय स्थल विस्थापन के घावों से रक्तरंजित जरूर होगा। राष्ट्रीय स्तर के कई हिंदी लेखकों ने डॉ. अग्निशेखर के निर्णय का समर्थन किया है। इस प्रकार का राष्ट्रीय समर्थन नि:संदेह उस मानसिकता का विरोध करता है जिसकी वजह से कश्मीर में भारत विरोध के बीज फूटे थे। यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष, संस्थान या राजनीतिक पार्टी को निशाना नहीं बनाता अपितु यह उस मानसिकता का विरोध करता है जिसने सबसे पहले अल फतह जैसे देश विरोधी संगठन पैदा किए और कश्मीर में राष्ट्रवादी धारा को कुंद करने की कोशिश की। एतिहासिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो 1947 के रक्तपात और उसके बाद की राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों ने राज्य में सांप्रदायिकता का बीज बोया। कश्मीर केंद्रित मानसिकता और धर्माधता के चलते ही 1990 तक कश्मीरी हिंदुओं को घाटी से पलायन करना पड़ा। 1947 के बाद जम्मू शरणार्थियों की पनाहगाह तो बना ही, शरणार्थियों ने जम्मू संभाग के मूल निवासियों के साथ मिलकर सियासी और सामाजिक संघर्ष लड़ना भी सीखा। 1931 तक जम्मू शांत था मगर उसके बाद की परिस्थितियों ने जम्मू को संघर्ष का केंद्र बना दिया। देखा जाए तो डॉ. अग्निशेखर की साहित्य वेदना और अकादमी सम्मान ठुकराना भी उसी निरंतर संघर्ष की एक कड़ी है जो आज तक अनवरत किसी न किसी रूप में जारी है। 1947 तक जम्मू संभाग की जनता भी राज्य के लिए स्वायत्तता की हामी भरती थी मगर अब परिस्थितियां बदल गई हैं। अब कश्मीर केंद्रित मानसिकता वाले लोग ही ऐसी मांगों के हामी हैं जिन्हें आए दिन बड़ी राजनैतिक चतुरता से पेश किया जाता है। हिंदुओं के साथ जम्मू के अधिकतर मुस्लिम भी संपूर्णत: भारत के साथ जुड़ाव के हामी हैं। राज्य के तीनों खित्तों में सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक असमानता और जम्मू व लद्दाख से भेदभाव के चलते जम्मू, लद्दाख और पश्चिमी पाकिस्तान एवं गुलाम कश्मीर के शरणार्थियों के साथ पंडित समुदाय ने मिलकर एक साझी विचारधारा को जन्म दिया है। यह विचारधारा अब स्थापित हो चुकी है और इस विचारधारा के मानने वालों का उद्देश्य कश्मीर केंद्रित मानसिकता से मुक्ति है। इस साक्षी विचारधारा को सुदृढ़ता देने के लिए डॉ. अग्निशेखर ने एक नवीन प्रयोग किया है। उनका क्षोभ मात्र विस्थापित पंडित समुदाय की मांगों की पैरवी नहीं करता अपितु सैद्धांतिक रूप से शरणार्थियों की अनदेखी और राज्य के दो खित्तों, जम्मू और लद्दाख के साथ निरंतर भेदभाव की मानसिकता पर भी एक बौद्धिक प्रहार है। जिस गैर मुस्लिम जनता ने कभी जिन हुकमरानों पर भरोसा किया था वह उस भरोसे को कायम रखने में असफल रहे हैं। भले ही शासक तबका जम्मू को अलग राज्य, लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश और पंडितों के लिए होमलैंड की मांगों को न माने मगर यह मांगें तार्किक जमीन पर खड़ी हैं। अपवादों को छोड़कर वादी ने हमेशा यह आभास करवाया है कि उच्की सच्ची और पूरी सहानुभूति भारत से नहीं बल्कि केंद्र से मन माफिक धनराशि के लिए भारत से अधूरा जुड़ाव प्रदर्शित करना मात्र है। 1947 के बाद जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच कोई मैच खेला गया तो वहां की अधिकतर मुस्लिम जनता ने पाकिस्तान का ही पक्ष लिया। यह कोई अनजानी खुराफातें नहीं हैं बल्कि एक सोचे समझे मनसूबे और खास मानसिकता की अलामत है। विशारत पीर की पुस्तक कफ्र्यू नाइट में ऐसी ही बातों का उल्लेख है जो कश्मीर सूबा की भारत विरोधी मानसिकता दर्शाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि विशारत पीर जैसे लोग अपनी पुस्तक के माध्यम से भारत विरोधी मानसिकता को प्रकट करने की कोशिश करते हैं जबकि अग्निशेखर अपनी पुस्तक पर मिलने वाले सम्मान को ठुकराकर उसी मानसिकता पर चोट करने का प्रयास कर रहे हैं जो भारत समर्थक पंडितों की विरोधी रही है। अग्निशेखर के निर्णय का समर्थन करने वालों में क्षमा कौल का नाम ही खुलकर सामने आया है मगर यह उतना ही खिन्न करने वाला है कि क्षमा के अतिरिक्त शायद ही जम्मू के किसी साहित्यकार ने खुलकर उनकी मुखरता का समर्थन किया है। दर्दपुर क्षमा जी का प्रसिद्ध उपन्यास है जिसमें विस्थापन के कारणों की विषमता को उभारा गया है। जिन लोगों ने इस उपन्यास को पढ़ा है वे कभी भी डॉ. अग्निशेखर के निर्णय को अनुचित नहीं ठहरा सकते। अग्निशेखर एक ऐसे प्रतिभा के धनी हैं जिन्होंने अपनी विलक्षण बौद्धिक क्षमता का उपयोग न सिर्फ कश्मीरी पंडित समुदाय बल्कि राज्य में राष्ट्रच्की सच्ची पैरवी और क्षेत्रीय भेदभाव के विरोध के लिए प्रत्येक पंथ और संप्रदाय के हर उस नागरिक के नाम कर दी जिसे भारत और भारतीयता से लगाव है।
(लेखक जेएंडके के सामाजिक विषयों के अध्येता हैं)  



पेंशन का असहनीय बोझ


दयासागर
वर्ष 2003 के बाद नियुक्त सरकारी कर्मियों के लिए केंद्र ने सेवानिवृत्त पेंशन योजना बंद कर दिया है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने भी वर्ष 2009 के बाद नियुक्त कर्मियों के साथ ऐसा ही किया है। नि:संदेह सहयोगात्मक प्रोविडेंट फंड (सीपीएफ) जैसी योजनाएं गैर पेंशनधारी कर्मचारियों के लिए लागू होंगी। लेकिन सेवानिवृत्त पेंशन के पहले के प्रावधानों के लिए सीपीएफ कोई समतुल्य स्थानापन्न नहीं है। स्थिति यह है कि एक सरकारी कर्मचारी को प्रतिमाह 40000 रुपये पेंशन मिल रहा है। (पेंशन पर महंगाई भत्ता भी मिलता है और ग्रेड संशोधन के साथ पेंशन को भी संशोधित किया जाता है)। यह किसी व्यक्ति द्वारा बैंक में 50 लाख से अधिक की धनराशि निश्चित समयसीमा तक जमा करने के बाद प्रतिमाह सूद प्राप्त करने की तरह है। क्या सीपीएफ योजना इससे मेल खाती है? कभी नहीं, इसके बावजूद सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए लोग लालायित रहते हैं। फलस्वरूप बड़ी संख्या में शिक्षित युवा बेरोजगार हैं। कोई भी सरकारी कर्मचारी संघ या एसोसिएशन पेंशन न देने की नई नीति के विरोध में उद्वेलित नहीं हुआ है। इसका जवाब इस तथ्य में निहित है कि कर्मचारी संघ/एसोसिएशनके बदले वर्ष 2010 (जेएंडके में) से पहले नियुक्त लोग इसका संचालन करते हैं और इसका लाभ भी उठा रहे हैं। यह उद्धृत किया जा सकता है कि केंद्र सरकार के कर्मचारी जो वर्ष 2030 या उसके बाद सेवानिवृत्त होंगे, उन्हें पेंशन का लाभ मिलेगा। वर्ष 2004 के बाद सरकारी सेवारत युवा जो हतोत्साहित होकर नौकरी खोज रहे थे, पेंशन के विवादों में पड़ने के बारे में नहीं सोच सकते। जबकि नव नियुक्त, कांट्रैक्चुअल, कनसॉलिडेट पे, डेलीवेजरों और कैजुअल कर्मचारी बड़े पैमाने पर रैलियां निकालते हैं। नियमित कर्मचारियों के नेतृत्व में कर्मचारी संघों द्वारा इनके प्रदर्शनों को संचालित किया जाता है। राजनीतिज्ञों के साथ-साथ सरकारी सेवारत वरिष्ठ कर्मचारियों पर भी बेरोजगार युवाओं का शोषण करने का आरोप लगता है। एक व्यक्ति जो हाल ही में सरकारी सेवा में शामिल हुआ है, जब उससे पूछा जाता है कि क्या भर्ती किए गए नए नियमित कर्मचारियों (जो वर्ष 2003 के बाद केंद्र सरकार और 2009 के बाद जेएंडके सरकार), कांट्रैक्चुअल, कंसालिडेटेड पे कर्मचारियों, डेलीवेजरों और कैजुअल कर्मचारियों का अलग-अलग एसोसिएशन है? इस बारे में वह कुछ तर्क दे सकता है। सरकारी नौकरियों की आकांक्षा रखने वाले बेरोजगारों की चिंता बढ़ाते हुए कर्मचारी केंद्र सरकार से सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 वर्ष करने और राज्य सरकार के कुछ कर्मचारी सेवानिवृत्ति की आयु 58 से 60 वर्ष करने की मांग उठा रहे हैं। निश्चित रूप से इससे सरकारी विभागों में उपलब्ध सीमित नौकरियों के अवसर कम होंगे। नि:संदेह सरकारी कर्मचारी जो पहले से नौकरी कर रहे हैं, सभी संभावित संसाधनों का उपयोग करेंगे और बढ़ी हुई सेवानिवृत्ति आयु को प्रभावित करेंगे। कारण, वे नीति योजना में भी शामिल हैं। लेकिन जब देश में शिक्षित/उच्च शिक्षा प्राप्त बेरोजगारों की भरमार है तो ऐसे में सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाना कहां तक न्यायोचित है, क्योंकि सरकार के पास संसाधनों की कमी है। यदि सेवानिवृत्ति आयु नहीं बढ़ाई जाती है तो पदों के निर्माण की नियमित प्रक्रिया पर ब्रेक नहीं लगेगा। नव नियुक्त कर्मचारियों के वेतन और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पेंशन भुगतान के बाद भी सरकार पर उतना बोझ नहीं पड़ेगा। यद्यपि आइएएस/ आइपीएस/ आइएफएस/आइआरएस और स्थानीय सेवा में जुटे लोग समयबद्ध पदोन्नति मिलने से अपने करियर में ठहराव महसूस नहीं करते हैं लेकिन आम सेवाओं में लगे लोग अनावश्यक ठहराव का सामना करते हैं। इसलिए यदि सेवानिवृत्ति की आयु नहीं बढ़ाई जाती है तो ऐसे कर्मचारियों को भी पदोन्नति मिलेगी और वे प्रोत्साहित होंगे। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जटिल प्रक्रिया के कारण गैर निष्पादन/ अयोग्य/भ्रष्टसरकारी कर्मचारियों को दंडित करना या उससे मुक्ति पाना बहुत कठिन है। जेएंडके के मुख्यमंत्रियों ने भी कई अवसरों पर उद्धृत किया है कि उन्होंने भ्रष्ट तत्वों से मुक्त होने की योजना बनाई है, लेकिन वे इसमें सफल नहीं हुए। इसलिए यदि सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई जाती है तो अवांछित कर्मियों को भी परोक्ष रूप से विस्तार मिलेगा। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि सेवानिवृत्ति की आयु दो वर्षो के लिए बढ़ाई जाती है तो जीपीएफ का भुगतान, नकद भुगतान को छोड़ दें तो सरकार दो वर्षो तक पेंशन और ग्रेच्युटी देने से इंकार कर देगी। सेवानिवृत्ति आयु बढ़ने पर नकारात्मक प्रभावों के सामने ऐसे तर्क कहीं नहीं टिकते हैं जैसे-1. विस्तृत सेवा अवधि के दौरान वेतन में बढ़ोतरी 2. सेवानिवृत्ति पर पेंशन में भी बढ़ोतरी 3. सरकार को अतिरिक्त खर्च करने पर दो वर्षो से भी अधिक समय तक वृद्ध और बीमार कर्मचारियों का निर्वहन 4. कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण विभागों में बहुत कम युवाओं का कार्यरत होना आदि शामिल है। इसलिए सेवानिवृत्ति की आयु कम करने के बजाय इसे बढ़ाने पर विचार करने की जरूरत है। बेहतर होगा कि पेंशन के लिए 20 वर्षो की समयसीमा के साथ नियमित सेवानिवृत्ति की आयु कम कर 55 वर्ष करने के प्रस्तावों पर विचार किया जाए। अभी भी यह प्रावधान रखा जा सकता है, अगर कुछ कर्मचारी असाधारण कर्तव्यनिष्ठ, अनुभवी, योग्य और स्वस्थ हों तो 55 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद दो वर्षो के लिए उन्हें सेवा विस्तार देने पर विचार किया जा सकता है। इससे कोई नुकसान नहीं होगा यदि अपवाद स्वरूप मामलों में 65 वर्ष की उम्र तक सेवा विस्तार की पुनरावृत्ति होती है। इस प्रकार 1. सरकार को अयोग्य तत्वों से मुक्ति मिलेगी 2. सरकारी नौकरियों में बेरोजगार युवाओं के लिए प्रवेश बाधित नहीं होगा 3. राजकोष पर वेतन का भार कम पड़ेगा। सरकार को भी चाहिए कि वह वर्ष 2003 के बाद नियुक्त लोगों के लिए सेवानिवृत्ति पेंशन बहाल करने पर विचार करे, क्योंकि सेवा संचालित नियमों जिनका सरकारी कर्मचारियों को अनुसरण करना होता है, प्राइवेट इंटरप्राइज/बिजनेस हाउस में किसी के काम करने की तुलना में अधिक कठोर है। सरकारी कर्मचारियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राइवेट इंटरप्राइज की अनुमति नहीं दी जा सकती है। सरकारी नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के शोषण और अन्याय की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सरकारी नौकरियों के लिए भर्ती प्रक्रिया में काफी विलंब हो चुका है।
(लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)

आइएसआइ के लिए काम करने वाला एसपीओ काबू


राजौरी : पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ व विभिन्न आतंकी संगठनों को सूचनाएं देने के आरोप में पुंछ पुलिस ने शुक्रवार को एक स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) को हिरासत में लिया। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से पाकिस्तान की मोबाइल कंपनी के सिम कार्ड भी बरामद किए हैं। पुलिस को सूचना मिली थी की एसपीओ मुहम्मद रशीद पिछले काफी समय से आइएसआइ के लिए कार्य कर रहा है।
(04 फरवरी, दैनिक जागरण)

कश्मीर का राजनीतिक हल चाहते हैं युवा


जम्मू। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि राज्य के युवा बंदूक संस्कृति के खिलाफ हैं और कश्मीर समस्या का राजनीतिक हल चाहते हैं। जम्मू विश्वविद्यालय में अध्यापकों के कार्यक्रम में भाग लेने के बाद मुख्यमंत्री से जब पत्रकारों ने पूछा कि एक सरकारी संगठन की रिपोर्ट में जिक्र है कि कश्मीर के लोग बंदूक नहीं साफ-सुथरा शासन चाहते हैं तो मुख्यमंत्री ने कहा कि कश्मीर के युवा हिंसा नहीं, बल्कि समस्या का राजनीतिक हल चाहते हैं। सरकार भी इस दिशा में काम कर रही है। दसवीं कक्षा की परीक्षा में फर्जीवाड़ा को लेकर शिक्षा मंत्री के पुत्र का नाम जुड़ने से उपजे विवाद पर उमर ने कहा कि मामले की जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच को सौंपा गया है, जिसकी रिपोर्ट एक सप्ताह में आने के बाद अगली कार्रवाई होगी। यूनाइटेड जिहाद काउंसिल के हेड सैयद सलाहुद्दीन के लोगों से निकाय चुनाव में भाग न लेने की अपील पर मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है। जो लोग चुनाव में हिस्सा लेना चाहते है वे लेंगे और यह पंचायत चुनाव में साबित हो चुका है। (

02 फरवरी, दैनिक जागरण)

नई भर्ती नीति के खिलाफ प्रदर्शन


आरएसपुरा। कस्बे में पीडीपी कार्यकर्ताओं ने युवा पीडीपी नेता व सरपंच गुरमीत सिंह बाजवा की अगुवाई में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर नई भर्ती नीति का विरोध किया। उन्होंने एसडीएम सुषमा चौहान को ज्ञापन पत्र भी सौंपा। बाजवा ने कहा कि राज्य की कांग्रेस-नेकां सरकार पढे़-लिखे युवाओं को रोजगार देने के बजाय उन्हें बेरोजगार करने पर तुली है। उन्होंने सरकार की नई भर्ती नीति की अलोचना करते हुए कहा कि इस नीति के तहत कौन कम वेतन पर सरकारी नौकरी करना चाहेगा। सरकार युवाओं को नौकरी देने में पूरी तरह से नाकाम हो गई है। युवा हताश की स्थिति से गुजर रहे हैं। उन्होंने सरकार को चेताया कि नई भर्ती नीति को अगर राज्य में लागू किया गया तो पीडीपी चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने सरकार से मांग की कि आरएसपुरा क्षेत्र से सेना में युवाओं की स्पेशल भर्ती भी की जाए। इस अवसर पर शाम लाल, बलदेव सिंह, करनैल सिंह, वेली राम सहित अन्य कार्यकर्ता उपस्थित थे। 
(05 फरवरी, दैनिक जागरण)