Thursday, January 5, 2012

उमर के काफिले पर पथराव


श्रीनगर। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) की फायरिंग में मारे गए युवक के घर मंगलवार सुबह सांत्वना जताने गए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। इस दौरान कुछ लोगों ने उनके काफिले पर पथराव किया, जिन्हें बलपूर्वक खदेड़ते हुए पुलिस ने दो लोगों को हिरासत में ले लिया। इस बीच, मुख्यमंत्री ने शोक संतप्त परिवार को यकीन दिलाते हुए कहा कि दोषी सीआइएसएफ कर्मियों को कठोर से कठोर सजा दिलाएंगे।
सनद रहे कि सोमवार को बारामूला जिले के बोनियार कस्बे में बिजली कटौती से उत्तेजित प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रीय जलविद्युत परियोजना निगम (एनएचपीसी) कार्यालय पर हमले के लिए आते देख सीआइएसएफ के जवानों ने फायरिंग कर दी थी। इसमें 12वीं कक्षा का एक छात्र अल्ताफ अहमद सूद मारा गया था, जबकि दो अन्य लोग जख्मी हो गए थे। इसके विरोध में व्यापारिक संगठनों ने 6 जनवरी को कश्मीर बंद का ऐलान भी किया है। मुख्यमंत्री सुबह हेलीकॉप्टर से उड़ी पहुंचे। उनके साथी डीजी सीआइएसफ के अलावा पीएचई मंत्री ताज मोहिउद्दीन भी थे।
मुख्यमंत्री वहां से अपने वाहन में दिवंगत अल्ताफ के घर बरनट गांव के लिए रवाना हुए, लेकिन रास्ते में लोगों ने नारेबाजी करते हुए उनका घेराव करने का प्रयास किया। इस पर मुख्यमंत्री ने वाहन से नीचे उतरकर नारेबाजी कर रहे लोगों को संबोधित किया। उमर ने कहा कि अल्ताफ को हर हाल में इंसाफ मिलेगा। उन्होंने कहा, यह एक कत्ल है और नाकाबिले बर्दाश्त गुनाह।
यह हद से ज्यादा ताकत के इस्तेमाल का नतीजा है, जिसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता। घटना के समय अल्ताफ ट्यूशन से लौट रहा था और उसके हाथ में किताबें भी थीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि अल्ताफ की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने के लिए वह किसी भी अदालत में जाएंगे। उन्होंने कहा, मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि किसी को भी अल्ताफ की मौत पर सियासत नहीं करने दी जाएगी। इसके बाद नारेबाजी कर रहे लोग शांत हो गए। यहां से मुख्यमंत्री सीधे दिवंगत के घर पहुंचे। उन्होंने शोक संतप्त परिवार के साथ संवेदना जताते हुए कहा कि अल्ताफ जिन हालात में मारा गया, वह अत्यंत दुखदायी है। उन्होंने सीआइएसएफ के जवानों की तरफ संकेत करते हुए कहा कि मैं पूछता हूं कि देश के अन्य भागों में भी क्या बिजली के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोली चलाई जाती है। यहां से वापसी पर जब उमर बोनियार से उड़ी की तरफ जा रहे थे तो कुछ लोगों ने उनके वाहनों पर पथराव किया, लेकिन वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने बल प्रयोग कर भीड़ को खदेड़ दिया। इस दौरान दो लोगों को हिरासत में भी लिया गया है।

लश्कर ने बनाया 21 महिलाओं का दस्ता


नई दिल्ली। भारत के खिलाफ हमले की नई साजिश रच रहा लश्कर-ए-तैयबा उसे अंजाम देने के लिए नया महिला दस्ता खड़ा कर रहा है। इसके लिए गुलाम कश्मीर में 21 महिलाओं के एक दस्ते को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सीमा पार से मिली खुफिया जानकारियों के मुताबिक दुख्तरान-ए-तैयबा नामक इस दस्ते का प्रशिक्षण मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के मास्टर माइंड जकीउर रहमान लखवी के गुर्गो की देख-रेख में जारी है। सेना मुख्यालय अधिकारियों के मुताबिक इस बारे में पुख्ता सूचनाएं हैं कि भारत के खिलाफ आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए चुनी हुई महिला आतंकवादियों का मुजफ्फराबाद के दिवालिया में प्रशिक्षण जारी है। सीमा पार आतंकियों की बातचीत से हासिल सूचनाओं के मुताबिक दुख्तरान-ए-तैयबा का यह दस्ता नियंत्रण रेखा या नेपाल के रास्ते भारत में दाखिल होने के मंसूबे बना रहा है। इससे पहले भी सीमा पार चल रहे 42 आतंकी प्रशिक्षण कैंप में महिला आतंकियों को तैयार किए जाने की सूचनाएं मिलती रही हैं। उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर में महिला अलगाववादी गुट दुख्तरान-ए-मिल्लत भी सक्रिय रहा है। सेना के हाथ लगी खुफिया सूचनाएं लश्कर की ओर से भर्ती अभियान में भी तेजी लाने की कोशिशों की ओर इशारा करती हैं। इस काम के लिए सीमा पार बैठे आकाओं ने  लश्कर के डिवीजनल कमांडर उस्मान भाई उर्फ छोटा रहमान को लगाया है। साथ ही जम्मू कश्मीर में तैनात सेना और सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए भी निर्देश दिए गए हैं। महत्वपूर्ण है कि बीते कुछ समय में घाटी में आतंकी घटनाओं का ग्राफ नीचे की ओर आया है। साथ ही सेना और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए आतंकियों का आंकड़ा भी बढ़ा है। लिहाजा लश्कर की सरगर्मी को घरेलू विवादों में फंसी पाकिस्तानी फौज और आइएसआइ की नई शह के तौर पर देखा जा रहा है।

कश्मीर में जिहाद को गति देने में जुटा लश्कर-ए-तैयबा


श्रीनगर। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने अब कश्मीर में जिहाद को गति देने के उद्देश्य से सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग के लिए सीमा पार 15 दिवसीय विशेष कैप्सूल कोर्स भी शुरू कर दिया है। इसमें कश्मीरी युवकों को शामिल किया जा रहा है। एक स्थानीय आतंकी यह प्रशिक्षण लेकर लौट भी आया है, जबकि एक अभी तक गुलाम कश्मीर में ही है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं पाया है कि कितनी संख्या में युवक सीमा पार प्रशिक्षण लेने गए हुए हैं। यह कोर्स न सिर्फ गुलाम कश्मीर और पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में जारी आतंकी कैंपों में बैठे दहशतगर्दो को करवाया जा रहा है, बल्कि कश्मीर में बीते दिनों भर्ती किए गए शिक्षित युवकों को भी वहां बुलाकर दिया जा रहा है। ऐसे युवकों को इस प्रशिक्षण के लिए एलओसी पार करने के लिए नहीं, बल्कि पासपोर्ट के आधार पर पाकिस्तान बुलाया जाता है ताकि वापसी पर सुरक्षा एजेंसियों को इनकी गतिविधियों पर संदेह न हो। इस नई साजिश का खुलासा तीन दिन पहले बांडीपोरा जिले के हाजन इलाके में पकडे़ गए लश्कर के एक तीन सदस्यीय मॉड्यूल की गिरफ्तारी से हुआ है। इसमें एक पूर्व आतंकी शामिल है, जबकि दो अन्य नए लड़के हैं। इनकी पहचान गुलाम मुहम्मद भट्ट, जहूर अहमद डार और निसार अहमद गनई के रूप में हुई है। एसपी बांडीपोरा बशीर अहमद खान ने बताया कि जहूर अहमद मई 2011 में एक फर्जी नाम पर पासपोर्ट बनवाकर पाकिस्तान गया था। उसे इलाके में सक्रिय एक लश्कर कमांडर ने ही भेजा था। उसने पाकिस्तान में जाकर लश्कर के एक कैंप में कंप्यूटर और साइबर दुनिया से संबंधित विभिन्न उपकरणों व तकनीकों का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद वह वापस लौट आया। वापस आने पर उसने एक पूर्व सरेंडर आतंकी गुलाम मुहम्मद भट्ट से संपर्क किया और उसके बाद वह स्थानीय युवकों की भर्ती में जुट गया। वह नए लड़कों को पाकिस्तान जाकर कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी के जेहाद में इस्तेमाल की ट्रेनिंग लेने जाने के लिए प्रेरित करने लगा। इन लोगों ने निसार अहमद डार नामक एक युवक को विशेष तौर पर कश्मीर में सक्रिय आतंकियों के लिए पैसा लेने और कंप्यूटर की ट्रेनिंग के लिए ही भेजा हुआ है। वह अभी भी गुलाम कश्मीर में ही है। एसपी ने इन लोगों द्वारा भर्ती किए गए और पार भेजे गए युवकों की सही संख्या नहीं बताई है, लेकिन दावा किया है कि जांच जारी है और कुछ महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं। उन्होंने बताया कि इन तीनों के पास से मैट्रिक्स शीट, कंप्यूटर, कोडवर्ड डायरी और कुछ अन्य दस्तावेज भी मिले हैं। जहूर अहमद का फर्जी पते पर पासपोर्ट बनाए जाने के मामले की जांच भी की जा रही है।

Sunday, January 1, 2012

नादान उमर का अंजाम


Jawahar Lal Kaul
जवाहर लाल कौल
 
बीता वर्ष जम्मू-कश्मीर की वास्तविक त्रासदी को रेखांकित करने वाला रहा है। यह आतंकियों और सरकार के टकराव से अधिक सरकार और सुरक्षाबलों के विवाद का वर्ष रहा। ऐसे प्रश्नों पर बहस चल पड़ी जो आपसी बातचीत के विषय हो सकते थे, मसलन- कश्मीर घाटी में आतंकवाद समाप्त हो गया है कि नहीं, आतंकवाद से लड़ने के लिए सेना को मिले विशेषाधिकारों को छीन लिया जाए कि नहीं आदि। 

दिलचस्प बात है कि यह सवाल स्वयं मुख्यमंत्री की पहल पर उठ रहे थे। वर्ष का आखिरी भाग तो इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए बीता। नौबत यहां तक आ गई थी कि राज्य में नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार के लिए भी खतरा पैदा होने लगा था। विवाद के तीन ही पक्ष थे- मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, कश्मीर में तैनात सशस्त्र बलों के अधिकारी और भारत सरकार। शेष सभी पक्ष और दल या तो तमाशाई बने रहे या बीच-बीच में अपने छिटपुट बयानों से आग में घी का काम करते रहे।

यह साल उमर अब्दुल्ला की अनुभवहीनता के भी उदाहरण पेश करता रहा। इसे उनके विरोधी उनका बचकानापन कहते हैं। सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून को निरस्त करने के पीछे मुख्यमंत्री की योजना अपने विरोधियों, खासकर पीडीपी नेता मेहबूबा मुफ्ती से मुद्दा छीनना था। अलगाववादी नेताओं सैयद अली शाह गिलानी और उमर फारूक के अतिरिक्त महबूबा मुफ्ती भी सेना की कथित ज्यादतियों को मुद्दा बना चुकीं थी। उनका आरोप था कि सेना बेकसूर लोगों की धर-पकड़ करती है और औरतों से छेड़छाड़ भी करती रही है। यह सब इसलिए हो रहा है कि उनके पास आतंकवाद के नाम पर विशेष अधिकार हैं और वे स्थानीय कानून व्यवस्था के सामने जवाबदेह नहीं हैं। 

राज्य में आतंकवादी घटनाओं में कमी और कुछ जिलों में तुलनात्मक रूप से शांति के आसार दिखने का राजनीतिक लाभ लेने के लिए उमर अब्दुल्ला ने एक योजना बनाई। अगर श्रीनगर समेत कुछ जिलों से सेना की गतिविधि कम कर दी जाए तो विपक्ष के आरोप ही अप्रासंगिक हो जाएंगे। जब सेना के पास विशेषाधिकार ही नहीं रहेंगे तो वह बिना स्थानीय पुलिस के कोई कार्रवाई ही नहीं कर पाएगी क्योंकि उसकी हर कार्रवाई स्थानीय नियमों और कायदों के ही तहत होगी। लेकिन उमर अब्दुल्ला इस सरल सी बात को भूल गए कि आतंकी गतिविधियों में कुछ कमी केवल सामयिक ठहराव मात्र है; उसकी समाप्ति नहीं। 

कश्मीर घाटी पहाड़ों से घिरा एक मैदान है, जिसमें एक जिले और दूसरे के बीच कोई भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं, जिनकी पहरेदारी करके किसी जिले को पड़ोसी जिले के आतंकियों से सुरक्षित रखा जा सकता है। घाटी को ही नहीं, पूरे राज्य को भी आतंकवाद के परिमाण के लिहाज से सुरक्षित और असुरक्षित भागों में नहीं बांटा जा सकता है। अपनी राजनीतिक योजना पेश करने से पहले उमर अब्दुल्ला ने सेना के अधिकारों में कटौती के दूरगामी परिणामों के बारे तो सोचा ही नहीं था और देश के अन्य आतंकवाद ग्रस्त क्षेत्रों में जारी व्यवस्था के बारे में भी जानकारी प्राप्त नहीं की थी। 

Omar Abdullah, Chief Minister of J&K
आतंकवाद सामान्य अपराधियों के विपरीत कानून को पूरी तरह नकारता है और उसे खुली चुनौती देता है। वह छिप कर वार करता है और आम जनता को आड़ बनाता है। समाज, प्रशासन में और पुलिस में डर पैदा कर ही आतंकवाद पनपता है। ऐसे गुटों को काबू करना असाधारण काम है, जिसके लिए असाधारण अधिकारों की आवश्यकता होती है। ऐसा कश्मीर में ही नहीं, देश के अन्य भागों में भी होता है और देश से बाहर अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी। देश के अन्य राज्यों में सामान्य कानूनों में ही ऐसी व्यवस्था है जिसमें सुरक्षा का अपना कर्त्तव्य निभाते समय किसी आवश्यक कार्रवाई के लिए सैनिकों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। उन पर सेना के नियमों के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। कश्मीर में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

आवेश में मुख्यमंत्री ने धमकी दी कि मैं विषेशाधिकारों को मुख्यमंत्री होने के नाते एक तरफा हटा सकता हूं, सैनिक अधिकारी इससे सहमत हों या नहीं। परोक्ष रूप से यह केंद्र सरकार को धमकाने के बराबर था, जो शायद उनका इरादा नहीं रहा होगा। विवाद इस हद पर पहुंचने के बाद जब मुख्यमंत्री ने कश्मीर के आपराधिक कानूनों में संशोधन करने की पेशकश की तो अलगाववादी गुट मैदान में उतर पड़े और ऐसी किसी भी कार्रवाई का विरोध करने की धमकी दी। जिस कदम से उमर अपने विरोधियों पर हावी होना चाहते थे, उसी से उनके विरोधियों के हाथ एक नया हथियार लग गया। 

मुख्यमंत्री अपने आप को आधुनिक दिखाने की धुन में यह भी भूल जाते हैं कि जिस पद पर वे हैं, उससे कहे गए किसी शब्द या किए गए छोटे से काम की तरंगें बहुत दूर तक जाती हैं और उनकी प्रतिध्वनि कभी-कभी अपने आप को ही भयभीत कर देती है। जब राजीव गांधी की हत्या में दोषी कुछ तमिल अपराधियों की फांसी की सजा माफ कराने के लिए तमिलनाडु विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया गया तो उमर अब्दुल्ला ने इंटरनेट पर टिप्पणी की कि अगर हम कश्मीर में संसद पर हमले के अपराधी अफजल गुरु को क्षमा करने का प्रस्ताव विधान सभा में पारित करें तो कैसा हंगामा होगा? उमर अब्दुल्ला शायद विनोद कर रहे थे लेकिन इसके ठीक कुछ दिन बाद प्रदेश विधान सभा में सचमुच एक निर्दलीय सदस्य ने ऐसा प्रस्ताव पेश करके उमर और कांग्रेस के लिए परेशानी पैदा कर दी। 

वर्ष 2011 अंतरंग वार्ताकारों की अब तक गोपनीय रपट के लिए विभिन्न पक्षों से बातचीत के लिए भी याद किया जाएगा। हालांकि अब तक सरकार इस रपट को दबाए बैठी है लेकिन वह इतनी गोपनीय भी नहीं रही है। कुछ तो कश्मीर में बातचीत के दौरान वार्ता में शामिल लोगों ने ही बताया और कुछ शायद वार्ताकारों या सरकार ने जानबूझ कर इसे लीक करवा दिया। आम तौर पर माना जाता है कि इस रपट में सरकार से सिफारिश की गई है कि कश्मीर में आंतरिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए और इस स्वायत्तता की मात्रा भी तय की गई है- 1953 से पहले की स्थिति बहाल की जाए। 

याद होगा इसी वर्ष शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद बख्शी गुलाम मोहम्मद के शासन के दौरान विधानसभा ने कुछ ऐसे कानून पारित किए जिनसे कई भारतीय कानून, जैसे चुनाव आयोग, महालेखाकार और सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार कश्मीर में लागू किए गए। शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला और अब उमर मानते रहे हैं कि इससे अनुच्छेद 370 का उल्लंघन होता है, पर जो संशोधन कश्मीर के कानूनों में हुए, उन्हें भी इसी अनुच्छेद के अनुसार किया गया और उन्हें जम्मू-कश्मीर की चुनी हुई विधान सभा ने ही तय किया तो उन्हें उल्लंघन कैसे माना जा सकता है? अगर अंतरंग वार्ताकारों ने ऐसी सिफारिश की है और भारत सरकार उस पर अमल करने वाली है तो यह न तो भारत और कश्मीर को पास लाने के बदले पीछे हटने वाला कदम होगा अपितु कश्मीर के गरीब और पिछड़े वर्गों के ही हित में भी नहीं होगा। इससे कश्मीर व जम्मू में दूरी और बढ़ जाएगी।

(लेखक : वरिष्ठ पत्रकार एवं जम्मू-कश्मीर मामलों के जानकार हैं।)

Wednesday, December 28, 2011

उमर अब्दुल्ला की खरी-खरी

केवल कृष्ण पनगोत्रा

श्रीनगर के नौहट्टा क्षेत्र में तारिक अहमद नामक एक दुकानदार की पत्थरबाजों ने हत्या क्यों की? मात्र इसलिए कि इस अमन पसंद नागरिक ने अलगाववादियों का कहना मानने से इंकार कर दिया। उसे अलगाववादियों द्वारा की जाने वाली हड़तालों का सिलसिला भी पसंद नहीं था। तारिक की मौत से वही सामने आया जो सच था। यानि कश्मीर घाटी में आए दिन की हड़तालों से बंद नजर आने वाले बाजार और सरकारी संस्थान जनता की मर्जी से नहीं बल्कि अलगाववादियों और उनके हड़ताली व पत्थरबाज समर्थकों के दबाव के कारण बंद रहते हैं।

कई बार राज्य से बाहर रहने वाले कश्मीरी युवकों ने इन हालात की पुष्टि की है। दबाव में पत्थरबाजी और हड़तालें करवाने की पुष्टि करते हुए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का यह कहना जायज ही है कि झूठ अधिक दिन तक नहीं छिपता, एक दिन लोगों के सामने सच्चाई आ जाती है। मुख्यमंत्री ने यह कहते हुए अलगाववादियों को आखिर खरी-खरी ही सुनाई है कि हिंसा व नफरत फैलाने वाले अब बेनकाब हो रहे हैं। पत्थरबाजी और अलगाववादियों द्वारा प्रायोजित आए दिन की हड़तालों और प्रदर्शनों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए उन्होंने एक समीचीन बात कही है कि अगर ऐसा कार्य किसी सुरक्षाकर्मी ने किया होता तो यह अलगाववादियों के टॉप एजेंडे में होता। उनकी यह नसीहत जायज ही है कि अलगाववादी गुंडागर्दी छोड़ दें।

यह वही पत्थरबाज हैं जिनको उकसाने वाले अलगाववादी सुरक्षाबलों पर मानवाधिकारों के हनन का इल्जाम लगाते आए हैं। क्या किसी आदमी के रोजमर्रा जीवन के आवश्यक और जायज क्रियाकलापों में इस प्रकार का हस्तक्षेप और जान से मार डालना मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं? कौन नहीं जानता कि अलगाववादियों को पाकिस्तान और आतंकियों को पाक गुप्तचर एजेंसी आईएसआई का समर्थन और सहायता प्राप्त है। बेशक अलगाववादी यह भी भली प्रकार जानते हैं कि कश्मीर में मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की क्या दशा है और सिंध प्रांत में अल्पसंख्यक पाक सरकार से किस कदर खफा हैं?

मात्र बलूचिस्तान या सिंध ही नहीं अपितु समूचे पाकिस्तान में कैसे मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। उन्हें यह भी मालूम होगा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई मात्र कश्मीर घाटी में ही आतंकियों और अलगाववादियों के सहयोग से भारत विरोधी दुष्प्रचार नहीं कर रही बल्कि विदेशों में भी कुछेक संगठनों के माध्यम से न सिर्फ भारत विरोधी प्रचार में मशगूल है बल्कि उन देशों की कश्मीरी नीति और सोच को प्रभावित करने का दुस्साहस भी कर रही है।

इसी साल जुलाई में एक अलगाववादी कश्मीरी गुलाम नबी फई का अमेरिका में फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) द्वारा गिरफ्तार किया जाना आईएसआई की करतूतों की अनेक परतें खोलता नजर आता है। अलगाववादियों को यह भी मालूम होगा कि फई की केएसी (कश्मीर अमेरिकी कौंसिल) किसके लिए काम कर रही थी। फई पर यह आरोप था कि उसने केएसी के सम्मेलनों के जरिए कश्मीर पर अमेरिकी नीति को आईएसआई के निर्देश पर प्रभावित करने की कोशिश की। केएसी की प्रत्येक बैठक और भाषण का एजेंडा भी पाक गुप्तचर एजेंसी के आला अधिकारी ही तय करते थे। यह एक तरह से भारत और अमेरिका के संबंधों को कमजोर बनाने वाली हरकत थी।

अमेरिका की कश्मीर नीति कुछ भी हो, लेकिन यह उस नीति से भी मेल नहीं खाती जो पाकिस्तान और उसकी गुप्तचर एजेंसी तय करती है। फई की अमेरिका में गिरफ्तारी जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों के लिए एक बहुत बड़ा सबक थी। फई जैसे पाक परस्त लोग व आईएसआई के एजेंट अब मात्र पाकिस्तान और आईएसआई से पैसा बटोर सकते हैं, जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग-थलग नहीं करा सकते। हाल ही में फई द्वारा की गई स्वीकारोक्ति से सारी तस्वीर सामने है।

दरअसल अलगाववादी कश्मीर में सुधर रहे हालात पर हतोत्साहित हैं और देश विरोधी प्रदर्शनों से हालात को बिगाड़ने के प्रयत्न में लग रहे हैं। पिछले दिनों कट्टरपंथियों के गढ़ समझे जाने वाले सोपोर कस्बे में जब मीरवाइज उमर फारूक ने देश विरोधी बयानबाजी करने के बाद जुलूस की अगुवाई करने से इंकार किया तो उत्तेजित लोगों ने उन्हीं पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। श्रीनगर के नौहट्टा, गोजवारा और डाउन-टाउन से भी ऐसी घटनाओं के समाचार मिले हैं। मालूम हो कि इसी महीने अलगाववाद समर्थक नौहट्टा और गोजवारा में जबरन दुकानों को बंद करवा रहे थे। इसी के चलते एक दुकानदार की मौत हो गई।

जाहिर है कि कश्मीर घाटी में जबरन हड़तालें और सरकार विरोधी प्रदर्शन करवाना आज की नहीं वर्षों पुरानी कवायद है। लगता है कि अमर अब्दुल्ला की फटकार और नसीहत, जिसमें उन्होंने अलगाववादियों को पथराव और हड़ताल के बजाय सियासी मोर्चे पर जनसमर्थन प्रदर्शित करने की चुनौती दी थी, से अलगाववादी बेचैन हैं और अपना चिरपरिचित राग अलाप रहे हैं। अलगाववादी यह भी जानते हैं कि सरकार का यह कठोर रवैया मात्र कश्मीर ही नहीं अपितु जम्मू संभाग में भी उजागर होता रहा है। अपनी जायज मांगों के लिए बेरोजगारों और सरकारी कर्मचारियों पर लाठीचार्ज आम बात है, लेकिन कश्मीर में लोग ऐसी हड़तालों से भी आजिज हैं जिनसे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी संकटग्रस्त होती है।

तारिक की मौत से यह भी स्पष्ट हो रहा कि अलगाववादियों द्वारा करवाई जाने वाली हड़तालें और प्रदर्शन शांतिपूर्ण नहीं बल्कि हिंसात्मक होते हैं। उन लोगों पर हिंसा की जाती है जो अलगाववादियों के इशारे पर हड़ताल के समर्थन में व्यापारिक प्रतिष्ठानों या सरकारी संस्थानों को बंद नहीं करते। ऐसी गंभीर परिस्थितियों में राज्य के मुख्यमंत्री ने ठीक ही कहा कि अलगाववादी गुंडागर्दी छोड़ दें। हड़ताल को सफल बनाने के लिए नागरिकों के साथ ऐसे क्रूर व्यवहार को मुख्यमंत्री गुंडागर्दी नहीं तो और क्या कहते

(लेखक : जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं।)

Sunday, December 25, 2011

अफस्पा पर अस्तित्व की लड़ाई


प्रो. हरिओम
कश्मीरी नेता सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। सेना को यह कानून राज्य में विद्रोह को कुचलने के लिए वैधानिक प्रतिरक्षा शक्ति प्रदान करता है। यह जरूरी नहीं है कि इस मांग को रखने के लिए कश्मीरी अलगाववादियों का हो-हल्ला परिलक्षित हो। कारण, वे किसी भी भारतीय प्रतीक या प्राधिकरण को मानने से इंकार करते हैं। लेकिन सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस, मुख्य विपक्षी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मा‌र्क्सवादी) या सीपीआई (एम) के तथाकथित मुख्यधारा के कश्मीरी नेताओं पर यह परिलक्षित होना आवश्यक है। यह इसलिए जरूरी है कि वे खुद को मुख्यधारा के नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उनकी मांग वही है जो वैश्विक आतंकवाद का केंद्र और भारत के दुश्मन नंबर एक कश्मीरी अलगाववादी और इस्लामाबाद आए दिन करते रहते हैं।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अफस्पा मुद्दे को अपने भाषण, बयान और ट्विट्स का आधार बना लिया है। उनका कहना है कि राज्य के कई हिस्सों में स्थिति बेहतर है। इसलिए वहां से अफस्पा हटाने की जरूरत है। उनका मूल तर्क यह होता है कि इससे कश्मीरी मुस्लिमों को सांस लेने की जगह मिलेगी, जिसकी उन्हें सख्त जरूरत है और एक नागरिक के रूप में वे इसके हकदार भी हैं। कई अवसरों पर वह सेना के साथ विचार-विमर्श में इस मुद्दे का समर्थन करते रहे हैं। उनके पिता और नेकां अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला जो कि केंद्रीय मंत्री हैं, यही राग अलापते हुए अफस्पा को हटाने की वकालत कर रहे हैं। अपने पुत्र की उद्देश्य प्राप्ति के लिए वे केंद्र में सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोगों के साथ लॉबिंग कर रहे हैं।
उमर के चाचा, पार्टी के पूर्व अतिरिक्त महासचिव और मुख्य प्रवक्ता मुस्तफा कमाल भी सेना और अफस्पा के कटु आलोचक हैं। वास्तव में, इस साल 25 अक्टूबर को कश्मीर घाटी में हुई आतंकी वारदातों और उसके बाद 11 दिसम्बर को नेकां के वरिष्ठ नेता और विधि मंत्री अली मुहम्मद सागर पर हुए जानलेवा हमले के लिए भी मुस्तफा कमाल सेना और अफस्पा को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। ये हमले मीरवाइज उमर फारूक के गढ़ में हुए थे। मुस्तफा कमाल की यह राय है कि सेना और अ‌र्द्धसैनिक बल इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि राज्य से अफस्पा हटे। दूसरे ही दिन उन्होंने शक की सुई सेना की तरफ मोड़ते हुए कहा कि अली मुहम्मद सागर पर जानलेवा हमला मीरवाइज उमर फारूक और नेकां के बीच दरार पैदा करने के लिए किया गया था, जिनके बीच कटुता और वैमनस्यता का इतिहास है।
पीडीपी भी अफस्पा के निरस्तीकरण को सुनिश्चित बनाने के लिए संघर्षरत है। यह नेकां पर इस मुद्दे को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और कश्मीर घाटी में इसका दोहन कर अब्दुल्ला वंश के जनाधार को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा रही है। व्यावहारिक रूप से यह कश्मीर के लोगों को आश्वस्त करने में सफल रही है कि नेकां सचमुच अफस्पा को हटाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है और इसने सत्ता में बने रहने के लिए इस मुद्दे पर अपने नजरिए से समझौता कर लिया है। वास्तव में, कश्मीर में दो प्रमुख राजनीतिक संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल जारी है। यह सच है कि इस खेल में पीडीपी आगे और नेकां पीछे है। दोनों पार्टियां अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए राजनीति कर रही हैं। हालांकि सत्ता के लिए नेकां और पीडीपी के बीच संघर्ष जारी है। इन दोनों पार्टियों के नेताओं का कहना है कि अफस्पा के हटने से कश्मीर के लोगों को सांस लेने के लिए जगह मिलेगी। उन पर विश्वास करना कठिन है।
मुद्दा यह नहीं है कि इस कानून के निरस्त होने से कश्मीरी मुस्लिमों को सांस लेने के लिए जगह मिलेगी। वास्तविक मुद्दा यह है कि अफस्पा के हटने से कश्मीर घाटी में अशांति दूर होगी या नहीं। अफस्पा के निरस्तीकरण से घाटी में मौजूदा अशांति कदापि दूर नहीं होगी। कारण, कश्मीर में अशांति अफस्पा लागू करने का नतीजा नहीं है। कश्मीरी नेता दशकों से जिस तरह शोर-शराबा की राजनीति कर रहे हैं, यह अशांति उसी का परिणाम है। इस मसले का मुख्य बिंदु धर्म पर आधारित पाकिस्तान की राजनीति, स्वतंत्रता, वृहत्तर स्वायत्तता और स्वशासन है। घाटी में जारी हिंसात्मक आंदोलन का अंतिम नतीजा विखंडन है। कश्मीरी नेता प्रतियोगितात्मक, सांप्रदायिकतावाद और अलगाववाद की राजनीति में शामिल हैं। उनका मकसद कश्मीर और देश के शेष हिस्सों के बीच विभाजन पैदा करना है। तथ्य यह है कि तथाकथित मुख्यधारा के नेकां नेतृत्व अफस्पा मुद्दे को फिर से उखाड़ने में लगे हुए हैं ताकि वास्तविक मुद्दों और अन्य मोर्चों पर मिली नाकामियों से लोगों का ध्यान हटा सकें। राज्य सरकार और विधानमंडल में जो कश्मीरी नेता हैं, वे अपनी मांगों पर पुनर्विचार कर अच्छा काम करेंगे। उन्हें लोकतंत्र, आर्थिक और प्रशासनिक मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें सुरक्षा संबंधी मामलों में हस्तक्षेप करने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि ये मामले रक्षा मंत्रालय के क्षेत्राधिकार में हैं। 

(लेखक : जम्मू विवि के सामाजिक विभाग के पूर्व डीन हैं।)