Tuesday, March 27, 2012

बजट में भी निष्पक्षता का अभाव


दयासागर
वर्ष 2012-13 का बजट पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और जेएंडके के वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर ने यह संदेश देने की कोशिश की कि यह बिना घाटे का बजट है। बजट को लेकर आज आम आदमी उतना उत्सुक दिखाई नहीं देता जितना 10-12 साल पहले दिखता था। लगता है कि आज यह धारणा बन गई है कि बजट बनाना और उस पर बहस करना और फिर पास कराना सत्ता पक्ष के लोगों का काम है। अगर कोई विवाद होता है तो उसका तब तक कोई अर्थ नहीं होता जब तक सत्ता पक्ष की ओर से कोई विवाद न हो। संसद में जिस तरह रेल बजट पेश हुआ और रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बाहर का रास्ता दिखाया गया वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अनोखी बात है। इससे यह संकेत मिलता है कि आज देश की राजनीति सिर्फ संख्याओं का खेल बनकर रह गई है। आम आदमी रोटी, कपड़ा और मकान की समस्याओं के कारण इतना हतोत्साहित हो गया है कि उसने भ्रष्ट राजनीति से छुटकारा पाने की निकट भविष्य में आस ही छोड़ दी है। आर्थिक सर्वे 2011-12 में मुद्रास्फीति दर 9.1 फीसदी दिखाया गया है। इसका भार आम आदमी पर पड़ता है। सरकारी मुलाजिम इसको झेल लेता है, क्योंकि सरकार हर साल औसतन अपने मुलाजिमों को 10 फीसदी से ज्यादा महंगाई भत्ता देती है। वर्ष 2012-13 की बजट में कोई ऐसी बात नहीं है कि कीमतें घटने की संभावना दिखाई दे। इसके बावजूद प्रणब मुखर्जी इस बजट को आम आदमी का बजट मानते हैं, जिसमें विधवाओं और विकलांगों का पेंशन 200 रुपये से बढ़ाकर सिर्फ 300 रुपये प्रतिमाह किया गया है। अब मनमोहन सिंह ही बता सकते हैं कि कैसे कोई 300 रुपये माहवार लेकर जी सकता है। कार्यपालिका में बैठे अधिकांश लोग भ्रष्ट व्यवस्था से उतने चिंतित दिखाई नहीं देते। कारण, बढ़ती महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं (शिक्षा, स्वास्थ्य) के गिरते स्तर का उन पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि वेतनमान बढ़ने से उनको आम आदमी के मुकाबले कम बोझ उठाना पड़ता है। फैक्टरियों और निजी क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों को किस तरह लताड़ा जा रहा है यह इस बात से सिद्ध हो जाता है कि जहां एक तरफ सरकारी कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ता अविलंब बढ़ाया जाता है, वहीं केंद्रीय बजट पेश करने के कुछ दिन पहले इंप्लाइज कांट्रिब्यूटरी फंड पर सरकार ने 2011-12 के लिए ब्याज दर 9.5 फीसदी से घटा कर 8.25 फीसदी कर दिया है। श्रमिक वर्ग के हित में केंद्रीय और राज्य के बजट में कुछ खास नहीं कहा गया है। व्यापारी वर्ग को टैक्स में छूट, कुछ समय तक एक्साइज में छूट, निवेश पर सब्सिडी या ऐसे ही अन्य प्रावधानों में कोई बुराई नहीं है लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि क्या व्यापारी वर्ग इसका कुछ लाभ अपने कर्मचारियों/कामगारों को दे रहा है या नहीं। पर ऐसा बहुत कम होता है। अब्दुल रहीम राथर ने वर्ष 2012-13 के बजट में निजी क्षेत्र के अस्पतालों, नर्सिग घरों और प्रयोगशालाओं को टैक्स में कुछ छूट देते हुए कहा है कि यदि इसका लाभ स्वास्थ्य सेवा लेने वालों तक नहीं पहुंचा तो सरकार ऐसी छूट वापस भी ले सकती है। राथर का यह कदम सराहनीय है, लेकिन यदि वह यह बात उद्योगों और दूसरे व्यापारिक संस्थानों के लिए भी कहते तो अच्छा होता। राजनीति के खिलाडि़यों का काम उत्तर प्रदेश में हुए चुनावों के बाद साफ नजर आने लगा है। पहले मुलायम सिंह और मायावती की पार्टियां कांग्रेस के खिलाफ प्रचार कर रही थीं और अब बसपा और सपा में कांग्रेस का साथ देने के लिए होड़ मची हुई है। इससे साफ है कि आज राजनीतिज्ञ मतदाता को सीधा-सादा समझते हैं। कोई भी निर्णय देश और आम मतदाता के हित में कम और कुर्सी पर बैठे लोगों के हित में ज्यादा लिया जाता है। हाल ही में श्रीलंका के विषय में करुणानिधि का दबाव और रेल मंत्री को बदलने की ममता की मांग से यह बात स्पष्ट हो जाती है।हमारे देश में सरकारी विश्वविद्यालयों में कार्यरत प्रोफेसरों को राजनीति में भाग लेने या सरकार की नीतियों पर टिप्पणी करने की छूट दी गई है, जबकि दूसरे कर्मचारियों को यह छूट नहीं है। इसके पीछे यह कारण है कि बुद्धिजीवी और उच्च सोच रखने वाले लोग समय-समय पर राजनेताओं को दिशा-निर्देश देते हैं, पर यहां भी उतनी दयानतदारी नहीं रही है। शिक्षा क्षेत्र के लोगों में भी सरकारी पदों पर आसीन लोगों की शाबाशी पाने की होड़ मची रहती है। यदि ऐसा न होता तो सरकार द्वारा वर्ष 2011-12 की जो आर्थिक सर्वे जारी की गई है, उस पर कुछ लोग जरूर सवाल उठाते। वर्ष 2011 के मुकाबले 2011-12 में कृषि उत्पादन/खाद्यान्न सिर्फ 2.29 फीसदी (24.48 से 25.04 करोड़ टन) बढ़ेगा, जबकि जनसंख्या 3.4 फीसदी बढ़ेगी (117 से 121 करोड़)। फिर भी दूसरी हरित क्रांति के लिए 2012-13 की बजट में कृषि क्षेत्र के लिए सिर्फ 5000 करोड़ रुपये रख कर ही बड़े दावे किए जा रहे हैं। विदेशों से गत वर्ष पहले छह माह में ही आयात मूल्य 236.67 अरब अमेरिकी डॉलर, जबकि निर्यात सिर्फ 150.9 अरब अमेरिकी डॉलर था। अनुमान के मुताबिक वर्ष 2011-12 में आयात-निर्यात का अंतर करीब सात लाख करोड़ रुपये होगा। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था मापने के लिए आयात-निर्यात का घाटा/लाभ एक अच्छा मूल्यांकन होता है। कुछ लोगों का तर्क है कि कच्चे तेल का आयात घाटे का मूल कारण है। यह तर्क सही नहीं है। अमेरिका भी बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और उसे साफ कर बेचता है। अमेरिका में एक मजदूर भारत के मुकाबले ज्यादा मजदूरी लेता है। फिर भी अमेरिका में आम आदमी को पेट्रोल भारत के मुकाबले 20 से 25 रुपये लीटर कम मिलता है। इससे साफ है कि भारत में सरकार तेल पर ड्यूटी और टैक्स बहुत अधिक लेती है। आम आदमी को विचार करना होगा कि भ्रष्ट अधिकारी और नेता जिस सरकारी दान का दुरुपयोग करते हैं, वह उसका ही है और जो उसको सब्सिडी दी जाती है उससे कहीं अधिक उससे टैक्स लिया जाता है। आर्थिक सर्वे के मुताबिक जल्द ही सरकार के ऊपर देश-विदेश का कर्ज 50,00,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। वर्ष 2011-12 में सरकार ने 2,67,986 करोड़ रुपये सूद दिया है। यूपीए-2 की 2012-13 बजट में भी 14,90,925 करोड़ रुपये का बजट खर्च करने के लिए 4,79,000 करोड़ रुपये का उधार लेने का लक्ष्य रखा गया है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की आज घर-घर में चर्चा हो रही है, पर सत्ता की दौड़ में शामिल राजनेताओं पर आम आदमी कैसे अंकुश लगाता है यह देखने में अभी समय लगेगा।
(लेखक जम्मू-कश्मीर मामलों के अध्येता हैं)

नरक तुल्य जिंदगी


प्रो. हरिओम
19 मार्च को नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर तीन दिवसीय धरना देने के लिए पश्चिमी पाकिस्तान के सैकड़ों रिफ्यूजी पहुंचे। जम्मू, सांबा और कठुआ जिले से बसों में सवार होकर रिफ्यूजी दिल्ली रवाना हुए। वे बेदर्द और असंवेदनशील केंद्र सरकार से सामान्य नागरिक और राजनीतिक अधिकार हासिल करने, राज्य में संपत्ति का अधिकार मांगने, जेएंडके सरकार के अधीन नौकरी प्राप्त करने, उच्च तकनीक और पेशेवर शिक्षा का अधिकार प्राप्त करने, बैंक से कर्ज लेने, सदन और स्थानीय निकाय चुनाव में मताधिकार की अनुमति मांगने के लिए सरकार को मनाने गए थे। 19 मार्च को भारतीय जनता पार्टी, जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी और जम्मू स्टेट मोर्चा के विधायकों ने भी विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया और रिफ्यूजियों के प्रति राज्य सरकार के नकारात्मक नजरिये के विरोध में सदन से वाकआउट किया था। उन्होंने 22 मार्च को भी ऐसा ही किया। यह उनका पहला आंदोलन नहीं था। वे राज्य में सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोगों के मानवीय दृष्टिकोण के खिलाफ वर्षो से आंदोलनरत हैं, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1947 में धार्मिक आधार पर भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद हजारों हिंदुओं जिसमें अधिकतर दलित वर्ग से संबंधित थे, जम्मू में आकर बस गए थे। यह सांप्रदायिक विभाजन था। वे द्विराष्ट्र सिद्धांत के आंदोलनकर्ताओं के हाथों प्रताडि़त, शोषित और शारीरिक उत्पीड़न से बचने और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए जम्मू आकर बस गए थे। लाखों गैर मुस्लिमों जिसमें हिंदू और सिख शामिल थे, ने नव निर्मित पाकिस्तान में अपने घरों को छोड़ यहां आ गए। वे जम्मू-कश्मीर के अलावा भारत के दूसरे भागों में भी बस गए और पूर्णरूपेण भारतीय नागरिक बन गए। पूर्व प्रधानमंत्री आइके गुजराल, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा, ब्रिटेन में पूर्व भारतीय उच्चायुक्त और स्तंभकार कुलदीप नैयर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रसिद्ध पत्रकार अरुण शौरी इनमें कुछ प्रसिद्ध नाम हैं। अगर वे जम्मू में बस गए होते तो उनकी स्थिति भी कुछ अलग नहीं होती। वे पाकिस्तानी रिफ्यूजियों की तरह अपने मौलिक अधिकारों के लिए लड़ रहे होते, जिसमें भारतीय समाज में गरिमापूर्ण जिंदगी जीना भी शामिल है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में समाज का एक तबका हमारे सामान्य नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की उपेक्षा कर रहा है। जम्मू और नई दिल्ली में 64 वर्षो से अधिक समय तक संघर्ष के बावजूद यह सब जारी है। इस संघर्ष में धरना, मार्च, प्रदर्शन, घेराव, याचिका दायर करना और गिरफ्तारियां आदि शामिल हैं। इस बीच जम्मू उनके और पुलिस के बीच अनेकों संघर्षो, गिरफ्तारियों, असहाय लोगों के घायल होने और परित्यक्त रिफ्यूजियों जिसमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं, का गवाह बना है। इसमें राज्य सरकार विफल रही है। कारण, रिफ्यूजियों का संघर्ष उन लोगों द्वारा नियंत्रित होता है, जिनका मानना है कि इनको नागरिकता का अधिकार देने का मतलब धारा 370 के तहत राज्य को जो विशेष दर्जा मिला हुआ है उसका न केवल क्षरण बल्कि राज्य की जनसांख्यिकी को भी बदलना होगा, जिससे सदन में जम्मू संभाग को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। केंद्र सरकार इसमें विफल साबित हुई है कारण वह कमजोर और दब्बू है। उसमें शासन कर रहे अभिजात्य कश्मीरियों के खिलाफ जाने का साहस नहीं है। स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बावजूद इन असहाय रिफ्यूजियों को किसी तरह की मदद नहीं मिली है। अब सवाल उठता है कि क्या जंतर-मंतर पर तीन दिन तक धरना-प्रदर्शन करने से इच्छित परिणाम मिलेगा? दुर्भाग्यवश, इसका सकारात्मक जवाब नहीं है। किसी को भी निराशावादी नहीं बनना चाहिए, लेकिन नई दिल्ली में बैठे मंत्रियों के रवैये को देखकर कोई भी व्यक्ति दूसरे तरीके से नहीं सोच सकता। यह रेखांकित करने की जरूरत है कि रिफ्यूजियों ने दिल्ली में नौ महीने धरना दिया। यह बहुत पहले की बात नहीं है। प्रधानमंत्री ने उन्हें एक बार फिर भरोसा दिलाया है कि उनकी समस्याओं का समाधान किया जाएगा, लेकिन इन आश्वासनों से कुछ नहीं मिलने वाला है। सचमुच राज्य में इन रिफ्यूजियों की दशा दयनीय हो गई है। रिफ्यूजियों के नेतृत्वकर्ता के अनुसार, उन लोगों की विश्वसनीयता को जांचा-परखा नहीं गया है जो केंद्र सरकार की नौकरी पाने का प्रयास कर रहे हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि ये रिफ्यूजी केंद्र सरकार के अधीन नौकरी पाने योग्य हैं। जहां तक लोकसभा चुनावों की बात है तो वे आम चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। हालांकि अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, उनका संघर्ष एक दिन रंग-ला सकता है। उम्मीद की जाती है कि नई दिल्ली में बैठे अधिकारी इन रिफ्यूजियों, जिनकी जिंदगी नरक तुल्य हो गई है, को विशेष उपचार प्रदान करेंगे। यह एक मानवीय समस्या है। यदि हमारे प्रधानमंत्री जो खुद रिफ्यूजी हैं, अगर श्रीलंका के तमिलों को संतुष्ट करने के लिए श्रीलंका के खिलाफ मतदान करने के बारे में सोच सकते हैं और यह कहते हैं कि यदि अमेरिकी प्रायोजित प्रस्ताव से श्रीलंका में तमिल समुदाय का भविष्य सुरक्षित रहता है और वे समानता, गरिमा, न्याय और आत्मसम्मान से जिंदगी जीते हैं, जोकि हमारा उद्देश्य है तो हम प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने के लिए तैयार हैं। तो फिर वे जम्मू में शिथिल पड़ चुके पश्चिमी पाकिस्तानी रिफ्यूजियों के प्रति इसी प्रकार का नजरिया क्यों नहीं अपनाते हैं? 22 मार्च को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत ने तमिल नेतृत्व को संतुष्ट करने के लिए श्रीलंका के खिलाफ मतदान किया था, क्योंकि श्रीलंका के तमिलों के साथ भारतीयों का हित जुड़ता है।
(लेखक : जम्मू विवि के सामाजिक विभाग के पूर्व डीन हैं।)

रिफ्यूजियों को मिले नागरिकता : भाजपा


जम्मू। प्रदेश भाजपा ने पश्चिम पाकिस्तान के रिफ्यूजियों को जम्मू-कश्मीर की नागरिकता देने की वकालत की। पार्टी के जन सम्मेलन कार्यक्रम को जारी रखते हुए भाजपा ने मंगलवार को पलौड़ा के वार्ड नंबर 60 में जनसभा आयोजित की। पार्टी प्रदेश प्रधान शमशेर सिंह मन्हास ने कहा कि आजादी के 65 साल बाद भी लाखों लोग अपमानजनक जिंदगी बसर कर रहे हैं। इन असहाय लोगों ने कई भूख हड़तालें, गिरफ्तारियां व अनशन किए। न तो राज्य सरकार ने आज तक इनकी बात सुनी और न ही केंद्र ने। मन्हास ने कहा कि राज्य सरकार का नागरिकता अधिकार न देने का एकमात्र कारण यही है कि यह लोग एक समुदाय विशेष से संबंध रखते हैं। इनके राज्य का नागरिक बनने से कश्मीर केंद्रित पार्टियों को राजनीतिक समीकरण बदलने का डर है। भाजपा ने हमेशा रिफ्यूजियों का मुद्दा उठाया है। जनसभा सम्मेलन में कर्ण सिंह, हंसराज मन्हास, जोगेंद्र सिंह चिब व राजेंद्र सिंह चिब मुख्य अतिथि रहे। (दैनिक जागरण, 21 मार्च 2012)

शरणार्थियों के मुद्दे पर फिर वाकआउट
जम्मू। पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों के मुद्दे पर वीरवार को एक बार फिर जम्मू स्टेट मोर्चा (जस्मो) और भाजपा के विधायकों ने सदन से वाकआउट किया। उत्तेजित विधायकों ने सरकार से शरणार्थियों को राज्य की स्थायी नागरिकता से वंचित रखने को सबसे बड़ा मानवाधिकार हनन करार दिया। विधानसभा में डिप्टी स्पीकर सरताज मदनी ने जैसे ही कार्यवाही शुरू करनी चाही, भाजपा और जस्मो के विधायकों ने अपनी सीटों पर खड़े होकर पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों का मुद्दा उठा दिया। विधायक बार-बार डिप्टी स्पीकर का ध्यान नई दिल्ली में अपनी मांग मनवाने के लिए गए शरणार्थियों की समस्याओं को हल करने और उन्हें स्टेट सब्जेक्ट प्रदान करने की तरफ दिलाने लगे। बिश्नाह से निर्वाचित जस्मो विधायक अश्विनी कुमार शर्मा ने कहा कि शरणार्थियों का मसला साठ साल पुराना है। इन लोगों को आज तक स्टेट सब्जेक्ट नहीं मिला है। ये लोग दिल्ली गए हैं और वहां भी इन पर लाठियां बरसी हैं। इसके साथ ही भाजपा के जुगल किशोर, चौ. सुखनंदन और अशोक खजूरिया भी शरणार्थियों के समर्थन में बोलने लगे। यह देख सत्ताधारी नेशनल कांफ्रेंस के चीफ व्हिप मुबारक गुल और विधायक विमला लूथरा भी अपनी सीटों पर खडे़ हो गए। इससे सदन में शोर-शराबा होने लगा। हालांकि उस समय मुख्यमंत्री भी सदन में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई। डिप्टी स्पीकर ने भी सरकार को कोई निर्देश जारी नहीं किया। इससे नाराज भाजपा विधायकों ने नारेबाजी शुरू कर दी। अशोक खजूरिया ने खिचड़ी सरकार हाय-हाय का नारा लगाया। इसके बाद भाजपा और जस्मो विधायक सदन से वाकआउट कर गए।
(दैनिक जागरण, 23 मार्च 2012)

पश्चिमी पाक रिफ्यूजियों के समर्थन में वाकआउट

जम्मू। पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों की स्थायी नागरिकता और उनके दिल्ली कूच को लेकर भाजपा, पैंथर्स व जम्मू स्टेट मोर्चा ने राज्य सरकार को सांप्रदायिक व रिफ्यूजी करार देते हुए विधानसभा से वाकआउट किया। विधायक इन रिफ्यूजियों को स्थायी नागरिकता प्रदान करने की मांग कर रहे थे। सोमवार को स्पीकर मुहम्मद अकबर लोन के आसन ग्रहण करते ही भाजपा, पैंथर्स व जस्मो के विधायक खडे़ हो गए। नगरोटा से भाजपा विधायक जुगल किशोर ने पाकिस्तानी रिफ्यूजियों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि ये लोग अपनी समस्याओं को हल कराने के लिए नई दिल्ली रवाना हुए हैं। क्या राज्य सरकार के पास इनकी समस्याओं का कोई हल नहीं है? प्रो. चमन लाल गुप्ता ने कहाकि पश्चिमी पाकिस्तान के रिफ्यूजियों को राज्य की स्थानीय नागरिकता और स्टेट सब्जेक्ट मिलना चाहिए। पैंथर्स विधायक बलवंत सिंह मनकोटिया और जम्मू स्टेट मोर्चा के अश्विनी शर्मा ने नारेबाजी करते हुए कहा कि पश्चिमी पाक रिफ्यूजियों को अधिकार दो। इस दौरान वे अपनी सीटों से उठकर आगे आ पहुंचे। भाजपा नेता अशोक खजूरिया ने कहा कि ये लोग हिंदू हैं, दलित हैं, इसलिए राज्य सरकार इन्हें स्टेट सब्जेब्ट नहीं दे रही है। इसके साथ ही सदन में कम्यूनल सरकार हाय-हाय, रिफ्यूजी विरोधी सरकार हाय-हाय के नारे गूंजने लगे। स्पीकर द्वारा कोई सकारात्मक संकेत न मिलता देख भाजपा, पैंथर्स व जस्मो के विधायकों ने 10.10 बजे सदन से वाकआउट कर दिया। (दैनिक जागरण, 20 मार्च 2012)

मां वैष्णो देवी गुफा के पास खनन पर रोक


जम्मू। श्री माता वैष्णो देवी की पवित्र गुफा के निकट मैगजीन निकालने के लिए प्रस्तावित खनन परियोजना पर हाईकोर्ट के डिवीजन बैंच ने फिलहाल रोक लगा दी है। बैंच ने इस मामले में केंद्र सरकार व श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने का आदेश दिया है। तब तक इस मामले पर स्टे लगा दिया है। एडवोकेट विलक्ष्णा सिंह व दिवाकर शर्मा ने समाचार पत्रों में छपी खबर का हवाला दिया है, जिसमें लिखा गया है कि केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय ने जेएंडके मिनरल्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन व नेशनल मिनरल्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को पवित्र गुफा के निकट पैंथल में मैगनीज का खनन करने तथा डेड बंर्ट मैगनीज उत्पादन का प्लांट लगाने की अनुमति दी है। दोनों वकीलों ने  कई आधार पर इस परियोजना को चुनौती देते हुए कहा कि यह क्षेत्र त्रिकुटा वाइल्ड लाइफ सेंच्युअरी के बीच आता है। लिहाजा, इससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का खतरा पैदा होगा। याचिका में आगे कहा गया कि यह क्षेत्र श्राइन बोर्ड की संपत्ति है। उन्होंने इस मामले में श्राइन बोर्ड में आरटीआइ भी दायर की थी, जिसके जवाब में बोर्ड ने स्पष्ट किया कि बोर्ड ने ऐसे किसी प्रोजेक्ट के लिए अपनी कोई जमीन नहीं दी और न ही बोर्ड अधिनियम के खिलाफ ऐसी कोई अनुमति दी है। याचिका में ऐसी किसी खनन को रोकने की अपील के साथ पूरी परियोजना को ही खारिज करने की मांग की गई। डिवीजन बैंच ने पूरे मामले पर गौर करने के बाद फिलहाल इस मामले पर स्टे लगा दिया और दो सप्ताह के बाद अगली तारीख निर्धारित की। एडवोकेट अनिल वर्मा ने श्राइन बोर्ड व अन्य संबंधित विभागों की ओर से नोटिस स्वीकार किया, जबकि केंद्र सरकार की ओर से एडवोकेट एसएस चिब ने बैंच का नोटिस स्वीकार किया।